इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
प्रकृति परम् ब्रम्ह का अद्भुद
विज्ञान है । प्रकृति समस्त क्रियाओं की जननी होती है । प्रकृति समस्त क्रियाओं की
नियंत्रक होती है । यह क्रियाँओं का सम्पादन व नियंत्रण जिस अद्भुद वैज्ञानिक
पद्धति से समपन्न करती है उसे मनुष्य प्रयत्न करके भी नहीं जान पाता है । प्रकृति
के उपरोक्त व्यक्त क्रिया सम्पादन व क्रियाओं के नियंत्रण की व्यख्या न कर पाने की
इसी विवशता को माया शब्द से ब्यक्त किया जाता है । माया शब्द का प्रयोग धर्म दर्शन
में प्रचुर परिमाप में किया गया है ।
जैसा कि मनुष्य शरीर के रचना के
संदर्भ में अंकित किया गया था, प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया के परिणाम स्वरूप
सृजित होता है कर्म । कर्ता पुरुष होता है । परंतु प्रकृति अपने विज्ञान के द्वारा
निहित गुणों की सहायता से पुरुष को बाध्य करती है कर्म के लिये ।
परम् ब्रम्ह ने प्रकृति के रूप में
अपने को प्रगट किया है । जो भी सुंदरता, शौर्य, शक्ति, उर्जा, प्रकृति के विभिन्न घटको में विस्तरित है वह ब्रम्ह
की ब्यापकता की द्योतक है । सूर्य, तारे, जहाँ असीम उर्जा के पुँज है वहीं नियंत्रित क्रिया
सम्पादन का जो स्वरूप प्रस्तुत करते है वह ब्रम्ह का व्यापक विज्ञान है प्रकृति के
रूप में । विडम्बना यह कि प्रकृति पूर्णरूप से आश्रित है ब्रम्ह पर जबकि ब्रम्ह
प्रकृति पर आश्रित नहीं है ।
मनुष्य शरीर में निहित ब्रम्ह के
अंश आत्मा की प्रतिक्रिया ब्रम्ह के विज्ञान प्रकृति के साथ जननी है कर्म की ।
कर्म शाश्वत होना विकास और कर्म दूशित होना पतन अवनती है । प्रकृति के रूप में
विस्तरित ब्रम्ह का विज्ञान अति रहस्यमय व गूढ है जिसके कारण आत्मा कर्ता को अति
नियंत्रित, अनुशासित कार्य संचालन प्रेरित करने की वाँक्षना होती है ।
प्रभु नारायण
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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