इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
ज्ञान यात्रा के वर्तमान विचार स्थल भक्ति के सम्बंध में पूर्व में व्यक्त विवरण
के क्रम में यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ब्रम्ह की व्यापक व्यवस्था है । प्रकृति
के माध्यम से ब्रम्ह ने समस्त सृष्टि की रचना की है, सृष्टि का नित्य प्रतिदिन संचालन कर रहे
हैं, और प्रकृतीय घटको की आयु पूर्ण होने पर उनके निर्मित स्वरूप को समाप्त कर पुन:
प्रकृति के घटको नामत: क्षिति, जल, गगन, पावक व समीर में विलीन करते हैं । मनुष्य का अस्तित्व इस व्यापक प्रकृतीय व्यवस्था
में अति लघु है । मनुष्य इस प्रकृतीय व्यवस्था का मात्र नाम मात्र का अंश है । इसलिये किसी भी मनुष्य को
प्रकृति की व्यवस्था में हस्तक्षेप, अथवा विघ्न, अथवा विचलन, अथवा गतिरोध उत्पन्न करने का
अधिकार नहीं है । मनुष्य मात्र उतना ही संचालन प्रवृत्ति करने को अधिकृत है जितना प्रकृति
उसपर आरोपित करती है । इसीलिये मनुष्य की अपनी इच्छाओं अथवा आसक्ति के कार्यों को वर्जित
किया गया है धर्मदर्शन शास्त्रों में । इसके विपरीत आत्मा की सहज प्रवृत्ति होती है
प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित करने की. आसक्ति सृजित होने पर उन्हे पाने की इच्छा
यह नित्य प्रतिदिन हर एक मनुष्य के साथ घटित हो रहा है । इसी दुर्बलता के अधीन हम सभी
नित्य-प्रतिदिन ब्रम्ह के कर्म संविधान अर्थात प्रकृति कर्ता है को स्वीकार नहीं कर
पाते हैं और इच्छा जनित कार्यों को लक्ष्य कर सारी शक्ति और उर्जा निवेषित करते रहते
हैं ।
उपरोक्त कथित ब्याधि को पहचानने की चेष्टा और उसे निवारण करने के लिये ब्रम्ह के
प्रकृतीय स्वरूप की ही बंदना करें क्योंकि समस्त ब्याधि का सृजन प्रकृति से ही उत्पन्न
होता है, प्रकृति की महिमा से ही होता है । यह प्रकृति में ब्रम्ह द्वारा पिरोया अद्भुद
विज्ञान है । इससे मुक्ति प्रभु की कृपा से ही सम्भव होगी । उन्ही का शरण ग्रहण करें
। उन्ही पर समर्पित हो जाँय । यही भक्ति है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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