बुधवार, 20 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा


इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
समस्त सृष्टि का संचालन परम् ब्रम्ह इन्ही दो घटको नामत: आत्मा और प्रकृति के परस्पर क्रिया द्वारा चला रहे हैं । समस्त सृष्टि की प्रगति इन्ही दो घटको की परस्पर क्रिया द्वारा सतत प्रगति की ओर अग्रसर है । इन्ही दो की परस्पर क्रिया के आधार पर ही सभी जीव सुख और दु:ख का भोग करते, परस्पर प्रेम और द्वेष करते जीवन जी रहे हैं । कितना अद्भुद विज्ञान है ब्रम्ह का जिसकी ब्यापकता असीमित है, जिसकी मर्यादा अति नियंत्रित है, जिसका न्याय अति निष्पक्ष है, सर्वभौम है । समस्त उपरोक्त को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ऊपर लिखे एक सूत्र में सिद्धांत का विमोचन किया कि हे अर्जुन समस्त सृष्टि में जो कुछ भी कर्म हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है । क्या विलक्षण विज्ञान है ब्रम्ह का प्रकृति के रूप में कि मनुष्य शरीर में निहित आत्मा अपने अहंकारबोध के कारण उपरोक्त सत्य को हृदयस्थ नहीं करती कि समस्त कर्म करने वाली प्रकृति है ।
आत्मा सतत प्रकृति के मध्य कार्यरत, प्रकृति के गुणों का भोग करते, उन गुणों में आसक्ति जनित करते, उन्ही प्रकृतीय घटको को पाने की अभिलाषा संजोये, उन्ही को पाने के लिये उद्यत चलता आया है, चलता जा रहा है । प्रकृतीय घटक सदैव यथा स्थिति रहें है और रहेंगे बस मनुष्य जन्म लेता बाल्यावस्था से नवयुवक फिर वयस्क और अंत में वृद्धावस्था को पार करते मृत्यु पर्यंत यात्रा करता ही रहेगा । यह प्रकृतीय चक्र आत्मा को नये नये स्वरूप नयी नयी स्थितियों का भोग कराते कार्य में ब्यस्त बनाये रखेगी ।
कार्य करने के लिये जन्म हुआ है । कार्य अवश्य करिये । आहवाहन मात्र इस ध्येय से कि कार्य प्रकृतीय ब्यवस्था के संविधान को स्वीकार कर उसकी मर्यादा के अनुरूप करिये । ऐसा करने से ही शांति और ऐश्वर्य उपलब्ध हो सकेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

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