इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ....
सती पार्वती फिरसे आँख खोलती हैं
तो उन्हे वहाँ कुछ भी नहीं दीखता है । अब वह शंकर्जी के पास जाती हैं । शंकरजी उनसे
पूँछते हैं कि देवी आपने कैसे परीक्षा लिया मुझे सत्यरूप में सारी बात बताइये ।
सती भगवान राम के महिमा से इतना भयभीत हो गई थी कि उन्होने शंकरजी से झूठ बोला और
कहा कि मैंने कुछ परीक्षा नहीं लिया बस उन्हे प्रणाम किया जिस प्रकार आपने किया था
। मुझे आपके कहे पर विश्वास है । यह बात ठीक उलटी थी । अभी थोडी देर पहले जब
शंकरजी उन्हे समझा रहे थे तब तो मानी नहीं चली गई परीक्षा लेने और अब कह रहीं हैं
कि मुझे आप के कहे पर विश्वास है । स्वत: अविश्वसनीय प्रमाणित होने वाली बात हुई ।
इसपर शंकरजी ने ध्यान(meditation) के द्वारा सब वृतांत जाना जो सती
ने किया था परीक्षा लेने की प्रक्रिया में ।
सती का आचरण जानकर भगवान शंकर
अत्यंत मानसिक दबाव की स्थिति को प्राप्त हुये । भगवान राम उनके ईष्टदेव थे । सती
ने ईष्टदेव की पत्नी का रूप धारण कर ईष्टदेव के सम्मुख हुई । अब यदि शंकरजी सती से
स्नेह करते है तो मानो वह ईष्टदेव की पत्नी से स्नेह व्यक्त कर रहे हैं । इतना बडा
संकट उत्पन्न हो गया कि पति पत्नी के सम्बंध विच्छेद (divorce) की स्थिति
सृजित हो गई ।
बहुरि बिलोकेहु
नयन उघारी । कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी ॥
पुनि पुनि नाइ राम
पद सीसा । चली तहाँ जहँ रहे गिरीसा ॥
गई समीप महेस तब
हँसि पूछी कुसलात ।
लीन्ह परीक्षा कवन
बिधि कहँहु सत्य सब बात ॥
सती समुझि रघुबीर
प्रभाऊ । भय बस शिवसन कीन्ह दुराऊ ॥
कछु न परीक्षा
लीन्ह गोसाई । कीन्ह प्रणामु तुम्हारिहि नाई ॥
जो तुम कहा सो
मृषा न होई । मोरे मन प्रतीति अस होई ॥
तब शंकर देखेहुँ
धरि ध्याना । सती जो कीन्ह चरित सबु जाना ॥
बहुरि राम मायहिं
सिरु नावा । प्रेरि सतिहिं जेहिं झूँठ कहावा ॥
हरि इच्छा भावी
बलवाना । हृदय बिचारतु शम्भु सुजाना ॥
सती कीन्ह सीता
करि भेषा । सिव उर भयहुँ बिसाद विषेसा ॥
जौ अब करहुँ सती
सन प्रीती । मिटहिं भगति पथ होहि अनीती ॥
परम पुनीत न जाइ
तजि किएँ प्रेम बड पाप ।
प्रगट न कह्त महेश
कछु हृदय अधिक संतापु ॥
क्रमश: अगले अंकमें ---
प्रभु नारायण
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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