शनिवार, 9 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
यह सृष्टि कर्म प्रधान है । मनुष्य का जन्म कर्म करने के लिये ही है । कर्म का सृजन प्रकृति और पुरुष के परस्पर क्रिया से होता है । प्रकृति ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । पुरुष ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति गुणों से युक्त है । प्रकृति के गुणों का भोक्ता पुरुष होता है । प्रकृति ब्रम्ह पर आश्रित होती है परंतु ब्रम्ह प्रकृति पर आश्रित नहीं होता है । इस प्रकार सब मिल कर एक ब्यूह का स्वरूप बन जाता है । इसी ब्यूह के अंतर्गत मनुष्य को अपना कर्म दायित्व पूरा करना होता है ।
प्रकृति के गुणों का भोक्ता होने के कारण पुरुष प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित कर लेता है । प्रकृतीय रचनाओं के प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है जिसके वशीभूत उनके स्वामित्व की कामना जन्म ले लेती है पुरुष में । प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया में पुरुष का स्वरूप कर्ता के रूप में होने के कारण उसमें अहंकार का सृजन हो जाता है । यह तीनो ही सृजन उसके ब्रम्ह स्वरूप के बिपरीत होते हैं । यही मूल होता है दोषपूर्ण क्रियाँओं के उद्भव का ।
यद्यपि कि दोषों को बताया गया परंतु इनके निवारण इतने सरल नहीं होते । अत्यंत निष्ठापूर्ण प्रयत्नों की आवश्यकता होती है । फिर प्रकृति की कार्य शैली इतनी विलक्षण होती है कि उपरोक्त दोष पुरुष कब ग्रहण कर लेता है यह उसे पता भी नहीं चल पाता है ।
कर्म सम्पादन अर्थात जीवन यापन के लिये मनुष्य शरीर की रचना, शरीर निर्माण में प्रयुक्त घटकों का सन्क्षिप्त परिचय के उपरांत अब जानना होगा वह सविंधान जिसके अधीन क्रिया सम्पादन अपेक्षित होता है । जानना होगा उन उपायों को जिनसे वह ज्ञात कर सकेगा कि उसमें कौन से दुर्गुण किस स्तर तक विद्यमान हैं । फिर जानना होगा कि उपस्थित दुर्गुणों का निवारण का उपाय । साथ ही जानना होगा कि उपस्थित दुर्गुणों के निवारण करते हुये नये दुर्गुणों का सृजन ना सम्भव होवें।
पुन: यह स्मरण कराना प्रसंग के अनुकूल होगा कि ज्ञान यात्रा मात्र सिद्धांतिक ज्ञान की नहीं अपितु कर्म सम्पादन में अभ्यास से सम्भव होगी । अत: परम् ब्रम्ह की अस्तुति भजन का अभ्यास सतत् करते आगे बढें । 

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण 

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