इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: -- -- --
मुनि नारद का गर्व अनुभव कर श्रीहरि भगवान ने अपने मन में
ठाना कि मैं मुनि के गर्व को अवष्य समाप्त करूँगा क्योंकि वह मेरे प्रिय भक्त हैं
और गर्व रहते उनकी भलाई नहीं है । नारद मुनि वहाँ से श्रीहरि से अनुमति माँग चले
वापस । श्रीहरि ने अपनी प्रकृति को आदेश किया और प्रकृति ने प्रभु के आदेश से मुनि
नारद जिस पथ से जा रहे थे एक अति सुंदर व विशाल नगर की रचना की । वह नगर श्रीहरि
के निवासपुरी से भी सुंदर था । उस नगर के राजा का नाम शीलनिधि था । उनकी एक अति
सुंदरी राजकुमारी थी जिसके सुंदरता का वर्णन करते कवि लिखता है कि श्रीलक्ष्मी भी
उस राज कुमारी की रूप सुंदरता को देख लज्जित हो जाय । उस राजकुमारी का स्वयम्बर
रचा गया था । इसलिये देश देश के राजा महिपाल उस नगर आये हुये थे और नगर खूब सजाया
गया था । मुनि नारद राजा शीलनिधि के राज दरबार में गये । राजा ने उनका विधिवत आदर
सम्मान किया । फिर राजा उस राजकुमारी को मुनि का आशिर्वाद पाने के लिये बुलाये ।
मुनि उस राजकुमारि की रूप सुंदरता को देख मोहित हो गये । राजा ने मुनि से
राजकुमारी की हस्त रेखाओं को देख उसका भाग्य बताने का आग्रह किया । मुनि उस
राजकुमारी की रूप मोहिनी से इतना मुग्ध हो गये थे कि कुछ बनावटी झूठ बाते कह वहाँ
से विदा लिये । रास्ते में जाते वह मन ही मन सोचते रहे कि क्या करूँ कि यह
राजकुमारी मुझे मिल जाय । मुनि की दशा यह हो गई कि पूजा ध्यान किसी में उनका मन
नहीं लग रहा था । उन्हे बस एक बिचार मथ रहा था कि राजकुमारी उन्हे कैसे मिले ।
प्रकृति की महिमा का साक्षात उदाहरण । जो मुनि अभी कुछ काल
पहले काम पर बिजय गर्व से सबको बताते घूम रहे थे वही अब काम प्रेरित इस कदर हैं कि
उन्हे भगवान का नाम ध्यान सब कुछ भूल गया है याद है सिर्फ राजकुमारी की सुंदरता और
उसे पाने की अभिलाषा । उनकी आत्मा पूर्णतया प्रकृति से परास्त है । प्रकृति के
गुणों की भोक्ता आत्मा इसी प्रकार प्रकृति के गुणों से आसक्ति जनित कर उसे पाने को
आतुर हो जाती है । ऐसे ही सृजित होता है दोषपूर्ण कर्म ।
शेष अगले अन्क में ---
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बेगि सो मैं
डारिहऊँ उखारी । पन हमार सेवक हितकारी ॥
तब नारद हरि पद सिर नाई । चले हृदयँ अहमिति अधिकाई ॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी । सुनहु कठिन करनी तेहिं केरी ॥
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन
बिस्तार ।
श्रीनिवासपुर ते अधिक रचना बिबिध प्रकार
॥
तेहिं पुर बसहिं सीलनिधि राजा । अगनित हय गय सेन समाजा ॥
बिस्वमोहिनी तासु कुमारी । श्री बिमोह जिसु रूप निहारी ॥
करइ स्वयम्बर सो नृपबाला । आए तहँ अगनित महिंपाला ॥
मुनि सुनि स्वयम्बर भूप गृह आये । करि पूजा भूप नृप बैठाये
॥
आनि देखाई नारदहिं भूपति राजकुमारि ।
कहहुँ नाथ गुण दोष सब एहि के हृदय बिचारि
॥
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बडी बारि लग रहे निहारी ॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदय हरष नहिं प्रगट बखाने ॥
लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाइ भूप सन भाषे ॥
सुता सुलक्षण कहि नृप पाहीं । नारद चले सोच मन माँही ॥
करौ जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहिं प्रकार मोंहि बरै कुमारी
॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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