रविवार, 24 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचारक्रम केंद्रित है ब्रम्ह के कर्म संविधान का पालन करने के उपाय के विषय में । संविधान का उलंघन सर्वथा अवाँक्षित होता है । प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था सृष्टि के संचालन की । ब्रम्ह ने सृष्टि बनाया । इस सृष्टि को संचालित करने के लिये प्रकृति बनाया । प्रकृति को संचालन क्षमता दी आत्मा के माध्यम से । प्रकृति गुणयुक्त है । आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता है । इसीलिये आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर लेती है । परिणामत: आत्मा का कार्य निस्तारण ब्रम्ह के कार्य संविधान के उलंघन की सीमा तक त्रुटिपूर्ण हो जाता है । जब मनुष्य को अपनी त्रुटि का बोध होता है तो तलाशता है त्रुटि से उबरने का मार्ग । इस तलाश में भक्ति सरलतम उपलब्धि है ।
भक्ति आराध्य ब्रम्ह की । भक्ति ब्रम्ह की व्यवस्था अर्थात प्रकृति की । क्रमश: निर्गुण और सगुण ब्रम्ह की । परम् ब्रम्ह निर्गुण है । प्रगट ब्रम्ह अर्थात प्रकृति गुणयुत है अर्थात सगुण । विचार किया जाय तो विदित होता है कि ब्रम्ह के कर्म संविधान की मूल मंशा भी यही है सगुण की सेवा । संविधान में व्यवस्था देना की सकल कर्मों की कर्ता प्रकृति है । विदित है कि सगुण कर्ता है । अव्यक्त परंतु निर्देश तो निर्गुण आत्मा के लिये ही व्यक्त किया गया है कर्म संविधान में । इस प्रकार निर्गुण की भक्ति सगुण के प्रति । यही आत्मा के भटकाव का मूल भी है । दायित्व निर्वाह तो वह कर्म संविधान के प्रति निष्ठावान होकर ही करता है । वही निष्ठा ही उसे आसक्ति में फँसाती भी है । यही माया की महिमा है ।
बिना भगवान की कृपा के माया से उबरना सरल नहीं है । सत्यनिष्ठा ही बंधन बन जाती है । बंधन में बँधते ही सत्यनिष्ठा लुप्त हो जाती है । वह अभियोगी कहा जाने लगता है । संविधान उलंघन का लान्क्षन लग जाता है । आत्मा विस्मय में पड जाती है कि मैं तो सत्यनिष्ठा से कार्य कर रहा था तो यह लांक्षन कैसा ? परंतु उस बेचारे को अनुभव नहीं कि उसकी सत्यनिष्ठा ही उसका लान्क्षन है । वस्तुत: यह ब्रम्ह की व्यवस्था प्रकृति इतनी विलक्षण विज्ञान से संचालित है कि इसे सहज़ प्रयत्नों से लांघा नहीं जा सकता है । कल्याण इसी में है कि त्राहिमाम् अर्थात इसी को समर्पित हो जाइये कि मै आपका सेवक हूँ आप जैसे चाहें मेरी सेवा का प्रयोग करिये । यही है भक्ति का स्वरूप ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें