इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
प्रकृति और पुरुष के पक़्रस्पर से कर्म सृजित होता है । ज्ञेय यह है कि दोनो के परस्पर में दोनो एक दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं और उस प्रभाव से कर्म पर क्या असर पडता है । पुरुष प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है इसलिये वह प्रकृति के गुणों में आसति सृजित कर लेता है परिणामत: प्रकृति उसकी इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुये उससे मनचाहा कार्य प्रेरित करा लेती है । वैसे तो यदि कोई भी व्यक्ति अपने कार्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करके स्वयँ देखे तो उसे उपरोक्त कथन की पुष्टि मिल जावेगी । फिरभी मैं एक शास्त्र सम्मत उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
एक बार नारद मुनि ने भगवा को श्राप दिया । ऐसा किस परिस्थिति में हुआ और ऐसा करने में मुनि नारद के शरीर में प्रकृति और पुरुष का परस्पर प्रतिक्रिया किस प्रकार हुई इसका वृतांत प्रस्तुत है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण
नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
एक जनम कर कारण एहा । जेहि लग राम धरी नर देहा ॥
नारद श्राप दीन्ह एक बारा । कलप एक लगि तव अवतारा ॥
गिरिजा चकित भई सुनि वाणी । नारद बिष्णु भगत पुनि ग्यानी ॥
कारण कवन श्राप मुनि दीन्हा । का अपराध रमापति कीन्हा ॥
शेष अगले अंक में -----
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