इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
विगत छ: अंकों में जो राम चरित्र
मानस का संदर्भ उद्घृत किया गया उसमें माता पार्वती जो कि शंकरजी की अनन्य आराध्य
व उनको समर्पित हैं वह किस प्रकार जरा सी बात को लेकर संशय की स्थिति सृजित कर
लेती हैं । शंकरजी उन्हे बारम्बार बताते भी हैं कि देवी वह मेरे ईष्टदेव ही थे
जिन्हे कि मैंने प्रणाम किया था परंतु विडम्बना का चर्मोत्कर्ष यह कि माता पार्वती
उनके बताये पर भी अपना संशय निर्मूल नहीं कर सकीं । यही थी प्रकृति की लीला ।
प्रकृति अति व्यापक है । प्रकृति अति बलवान है । प्रकृति की कार्यशैली का विज्ञान
अति गूढ होता है ।
प्रकृति की ही रचना यह मनुष्य शरीर
भी है । प्रकृति का विस्तार समस्त ज्ञान सीमा तक है । अग्नि, जल, वायु, आकाश(space), धरती प्रकृति के मुख्य घटक है । समस्त सृष्टि प्रकृति की ही
रचना है । इन्ही कारणों से प्रकृति की क्षमता अपार होती है । किसी कर्म प्रक्रिया
का सूत्रपात, संचालन, नियंत्रण, शमन प्रकृति कहाँ से, किस श्रोत से, किस आयाम तक, किस माध्यम से घटित करेगी इसका पूर्वानुमान मनुष्य
को ज्ञात कोई गणित या विज्ञान सम्पादित नहीं कर सक है ।
मनुष्य शरीर की रचना जैसा कि पूर्व
के अंक में लिखा गया था कि प्रकृति और पुरुष दो घटको के समंवय से सम्भव होती है ।
मनुष्य शरीर में विद्यमान पुरुष और प्रकृति की परस्पर क्रिया से सृजित होता है
कर्म । यह तीनों ही घटक नामत: प्रकृति, पुरुष, कर्म परम् ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप है । इन तीनों का
संचालन, नियंत्रण परम् ब्रम्ह ही करता है । यह बोध ही ज्ञान है ।
प्रकृति की कार्यशैली ऐसी होती है
कि वह मनुष्य को किसी कर्म के सम्पादन में उसे कर्तापन का अहसास कराती है । यही
अहसास सृजित करता है अहंकार । पुरुष अवयव के लिये अहंकार महाब्याधि स्वरूप होती है
। इसके जन्म हो जाने पर मनुष्य शरीर के पुरुष अवयव अर्थात आत्मा की कार्य वृत्ति
त्रुटिपूर्ण हो जाती है । माता सती तर्क करती हैं कि मेरे पतिदेव देवताओं में
श्रेष्ठ परम, पूज्य हैं और इन्होने भला दो राज कुमारों को प्रणाम
किया । ऐसा तो वेदों में भी नहीं लिखा है कि परम् ब्रम्ह मनुष्य शरीर में प्रगट हो
सकते हैं । ऐसा तो भला विष्णू भगवान भी, यदि कंचिद सुरों के कल्याणार्थ मनुष्य शरीर भी धारण
करलें तो स्त्री को खोजते बन बन भटकने का कर्म नहीं करेंगे । यह साक्षात् उदाहरण
है अहंकारयुक्त आत्मा के कार्य प्रणाली का । यह पता नहीं चलता मनुष्य को कि वह कब
पथ से भटक गया । प्रकृति की कार्य शैली अद्भुद व विलक्षण होती है ।
भगवान शंकर बारम्बार समझाते हैं
सती को फिर उनकी प्रतिक्रिया होती है कि यदि मेरे कहे संतोष नहीं हो रहा है तो
जाकर परीक्षा ले लीजिये । यह प्रतिक्रिया भी प्रकृति की ही रचना थी । बाद में जब
सती परीक्षा लेकर लौटी, असत्य बोला, फिर ध्यान करके शंकर जी ने जाना
उसके बाद तो प्रतिक्रिया न करके संतोष किया –
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड पाप ।
प्रगट न कह्त महेश कछु हृदय अधिक
संतापु ॥
यह संतोष पहले क्यों नहीं जागृत
हुआ जब उन्होने सती को परीक्षा लेने को कहा था ? यह प्रकृति की लीला का स्वरूप है
। देवता, ज्ञानी, महर्षि, कोई प्रकृति के फंद से पार नहीं पा पाता ।
प्रभु नारायण
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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