इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: -- --
नारद मुनि अति आतुर हुये उस राजकुमारी को पत्नी रूप में
पाने के लिये । अपने मनोरथ को पूरा करने के लिये श्रीहरि से वरदान भी माँगा । इसके
बाद भी उसे पा नहीं सके । पराजित महसूस करने लगे । पराजय का भाव मन में आते ही
क्रोध सृजित हुआ । स्वाभाविक रूप से क्रोध श्रीहरि को लक्षित था । क्यों उन्होने
हमारी सहायता नहीं किया । चल पडे श्रीहरि से निपटने । मार्ग में ही श्रीहरि मिल
गये । श्रीहरि उसी राजकुमारी को अपनी पत्नी सदृष्य साथ लिये आ रहे थे । मिलते ही
श्रीहरि ने मृदु बचन में पूँछा कि मुनिबर क्यों ब्यग्र दीख रहें हैं ? मुनिबर का क्रोध ऊबल पडा । जो कुछ भी मनमें आया बोलते चले गये मुनि महोदय ।
उनको कंचिद किसी मर्यादा का बोध नहीं रह गया था ।
प्रकृति की लीला का स्वरूप प्रत्यक्ष है । नारद मुनि ने
पहले अमर्यादित बर माँगा । यद्यपि की श्रीहरि ने उन्हे बर यही दिया था कि जिस
प्रकार आपका हित होगा मैं वही करूँगा । परंतु इस कहे का अर्थ मुनिजी ने यह लगाया
कि श्रीहरि हमारा मनोरथ पूर्ण करेगे । राजकुमारी को पत्नी रूप में नहीं पा सके ।
परिणामत: और भयंकर अशिष्ट आचरण को अग्रसर हुये । श्रीहरि को दुर्बचन भी कहे ।
यह प्रकृति की असीमित शक्ति और अद्भुद कार्यशैली का परिचायक
है ।
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपद चले कमलापति पाहीं ॥
देहउँ श्राप की मरिहऊँ जाई । जगत मोर उपहास कराई ॥
बीचहि पंथ मिले दनुजारी । संग रमा सोई राजकुमारी ॥
बोले मधुर बचन सुरसाई । मुनि कहँ चले बिकल की नाई ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
पर सम्पदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरे इर्ष्या कपट विषेसी ॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायेहु । सुरन्ह प्रेरि विष पान
करायेहु ॥
असुर सुरा विष शंकरहि आपु रमा मनि चारु ।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहार
॥
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावहि मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । विस्मय हरष न हियँ कछु धरहू ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम शुभाशुभ तुम्हहि न बाधा । अब लग तुम्हहि न काहू साधा ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा । पाहवुगे अब आपन कीन्हा ॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोई तन धरहु श्राप मम एहा ॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्ह हमारी । करिहहि कीस सहाय तुम्हारी ॥
मम अपकार कीन्ह तुम भारी । नारि बिरह तुम होब दुखारी ॥
शेष अगले अंक में --
--
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें