शनिवार, 16 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
क्रमश: --  -- 
नारद मुनि ने क्रोधवश श्रीहरि को श्राप दिया । श्रीहरि ने उदारता पूर्वक नारद का श्राप सिरोधार्य किया । श्रीहरि ने जिस माया का विस्तार किया था, जिसमें फंस नारद पहले राजकुमारी के मोह में आसक्त हुये फिर उसे पाने की इच्छा संजोये पाने का प्रयत्न किये और उसे न पाने पर क्रोधवश श्रीहरि को श्राप दिये और दुर्वचन कहे, को वापस खीचलिया । माया हट जाने पर नारद मुनि ने देखाकि वहाँ न राजकुमारी है न ही नारद के मन में पहले जैसे उन्माद ही रह गये । बदली हुई स्थिति का अनुभव कर नारद अति भयभीत हुये । श्रीहरि का माया विस्तार का उद्देष्य पूरा हो चुका था । वह नारद के अभिमान को नष्ट करना चाहते थे जिसके तहत नारद कहते घूम रहे थे कि उन्होने माया पर विजय प्राप्त कर लिया है । नारद को भयभीत देख श्रीहरि ने उन्हे सांत्वना करायी और परामर्श दिया कि भगवान शंकर की कृपापात्र बने जिससे उन्हे मन की शांती मिलेगी ।
प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया से कर्म सृजित होता है । प्रकृति गुणयुक्त होती है । पुरुष प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । इन कारणों से पुरुष प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित कर लेता है। आसक्त आत्मा प्रवृत्ति करती है दोषपूर्ण कर्म।
प्रकृति अति विस्तृत अतिशक्तिशाली अद्भुद विज्ञान से युक्त गुणों की धारक है इसलिये वह आत्मा को भली भाँति अपने नियंत्रण में करने में सक्षम होती है । यदि मनुष्य के अस्तित्व को प्रगट करने वाले घटक के रूप में आत्मा को माना जाय तो प्रकृति को उसका नियंत्रक कहा जा सकता है । आत्मा और प्रकृति इन्ही दोनो का सही स्वरूप का ज्ञान व कर्म सृजन में इन दोनो की सही ढंग से परस्पर क्रिया का उचित नियंत्रित संचालन ही मनुष्य की जीवन यात्रा है । जो जितने ही सज्ञान पूर्वक नियंत्रित संचालन को अंजाम दे सकता है वह उतना ही उत्कृष्ट जीवन का भोगी हो सकता है । मनुष्य जीवन में व्याप्त सकल उद्वेग, अशांति, तनाव आत्मा और प्रकृति के अनियंत्रित व विधि के विधान के विपरीत संचालन का परिणाम होती हैं । इसलिये सज्ञांनपूर्वक विधि के संविधान के अनुकूल आचरण द्वारा शांत तनाव रहित जीवन यापन सुलभ हो सकता है । विधि के संविधान की चर्चा अगले अंक से सतत ।  

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