इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र
ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग
को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही
स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
कर्ता आत्मा है नियंत्रक प्रकृति
है और दोनो की परस्पर क्रिया का परिणाम कर्म है । कर्म पर आधारित प्रकृति का न्याय
है । न्याय के आधार पर ही प्रकृति आत्मा को एक शरीर के कार्यकाल पूरा होने पर
दूसरा शरीर आवंटित करती है । विचार्णीय हो जाता है कि जब प्रकृति स्वयँ नियंत्रक है तो दोषपूर्ण कर्म का सृजन होता
कहाँ से है । इसके लिये बताया जाता है कि कर्ता आत्मा के कर्तब्य निर्वाह में विचलन से । प्रश्न उठता है कि इस विचलन का कारण
कहाँ से सृजित होता है । बताया जाता है कि विवेक के अभाव से । ज्ञातब्य है कि
विवेक वह मानसिक शक्ति/क्षमता है जिससे मनुष्य उचित-अनुचित, ग्राह्य-त्याज्य, योग्य-अयोग्य, का परीक्षण करता है अंगीकार करता है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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