मंगलवार, 19 नवंबर 2013

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: |
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
अभिप्राय है समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । यह ब्रम्ह का संविधान है । ब्रम्ह ने जो सृष्टि की रचना की है उस रचना के लिये माध्यम ब्रम्ह ने प्रकृति को बनाया है । प्रकृति में सृजन क्षमता है परंतु संचालन क्षमता नहीं है । इस संचालन क्षमता की पूर्ति करने के लिये ब्रम्ह ने प्रकृति के मध्य में अपना अंश पिरोया है जिसे कि आत्मा के रूप में जाना जाता है । इसी आत्मा को साँख्य दर्शन में पुरूष कहा गया है । पुरुष ज्ञाता होता है प्रकृति अंश का परंतु गुणयुक्त प्रकृति के गुणों का भोक्ता होता है । यह ब्रम्ह की महिमा जिसे धर्मदर्शन में माया कहा जाता है का प्रभाव कि पुरुष प्रकृति का ज्ञाता होते हुये भी प्रकृति के गुणो का आसक्त हो जाता है । आसक्ति निमित्त बन जाती है कर्म सम्पादन को त्रुटि पूर्ण बनाने में क्योंकि नित्य संसार के प्रयोजनों के लिये पुरुष आत्मा ही नित्य कर्ता होती है । आसक्ति उसे ब्रम्ह के कर्मसंविधान के प्रति अचेत कर देती है । वह न्रम्ह के कर्म संविधान को विस्मृति कर अपनी रुचि का क्रियांवन प्रेरित करने को चेष्टारत हो जाता है ।
प्रकृतीय गुणों में आत्मा की आसक्ति का आगला कदम होता है उसे पाने की इच्छा । उसपर स्वामित्व की अभिलाषा । यह मूलत: अपनी आसक्ति को स्थायी रूप से भोग के उद्देष्य से जनित होती है । उदाहरण के लिये एक ब्यक्ति की आत्मा को एक बार किसी सुंदर कार में यात्रा का सुख अनुभव मिला तो यही सुख की अनुभूति वह स्थायी रूप से भोग की कामना कर कार के निज़ी स्वामी बनने को इच्छुक हो जावेगा । यह पाने की इच्छा उसके यात्रा के सुख अनुभूति का परिणाम होती है ।
किसी प्रकृतीय घटक को उपरोक्तानुसार पाने की इच्छा आत्मा में समा जाने पर उसका कर्म संचालन ब्रम्ह के कर्म संविधान के प्रति अचेत कर देता है कि कर्ता प्रकृति है वह अपनी इच्छा को प्रधानता देते हुये हठात इच्छा वाले कार्य को ही प्रेरित करने को उद्यत होता है । वह यह नही स्वीकार कर पाता कि कंचिद प्रकृति ने उसे एक बार उस कार की यात्रा का सुख प्रदान किया वह हठात उसी सुख का स्थायित्व सुलभ होने को चेष्टारत हो जाता है ।  

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