इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण
भक्ति । कर्म संस्कार को शोधकर त्रुटिपूर्ण से ब्रम्ह संविधान के अनुकूल आचरण बनाने
का उपाय । इस भक्ति के लिये आवश्यक गुणों (1) आराध्य के प्रति आदर भाव (2) आराध्य को
समर्पण की चर्चा के उपरांत आदिकालीन विद्वान महात्माओं का मत । अधिकतर महात्माओं ने
आराध्य और आराधक के मध्य स्वामी और सेवक के भाव को पुष्ट किया है । आराध्य स्वामी होता
है और आराधक सेवक होता है । मनुष्य शरीर के अवयव प्रकृति और आत्मा के संदर्ब में प्रकृति
स्वामी और आत्मा सेवक का भाव ही विधि सम्मत है । यह ब्रम्ह संविधान के अनुकूल है ।
जबकि मनुष्य शरीर में उपलब्ध घटक प्रकृति और आत्मा में संसार के कर्मों की दृष्टि से
आत्मा नित्य कर्ता होता है । परंतु यही विशिष्ट स्थिति ही समझना ही विषेस महत्व का
है । नित्य कर्ता आत्मा ही है परंतु प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था कार्य
करती है । आत्मा कर्ता है । मात्र व्यवस्था के अंग के रूप में । सेवक के रूप में ।
यह हृदयस्थ होना ही भक्ति है ।
प्रभु नारायण श्रीमन
नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण
नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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