इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ----
माता पार्वती ने परीक्षा लेने के
उद्देष्य से माता सीता का रूप धारण करके उसी पथ पर आगे चली जिस पथ से भगवान राम और
लक्षमण माता सीता को खोजते आ रहे थे । सती को सीता के रूप में देख लक्षमण जी तो
कुछ भ्रमित अवश्य हुये परंतु कुछ बोले नहीं । परंतु प्रभु श्रीराम को सती का कपट रूप
चिन्हित करने में रंचमात्र भी विलम्ब नहीं हुआ । उन्होने सती पार्वती को दोनों हाथ
जोड कर प्रणाम किया फिर बोले कहाँ गये शंकरजी जो अकेले बन में आप विचरण कर रहीं है
। सती पार्वती की दशा दयनीय हो गयी और वह तत्काल भगवान शंकर के पास जाने को उन्मुख
हुई । जाते हुये पथ में मन ही मन पछताने लगी कि मैंने शंकरजी का कहा न मानकर बडी
भूल की और अब जाकर क्या बताऊँगी ? उनकी क्षीण मन:दशा की अधिक बृद्धि तब हो गई जब भगवान
राम ने उन्हे कुछ अधिक अपना प्रभाव अनुभव कराया । सती देखती हैं कि आगे राम, लक्षमण, सीता जा रहें हैं । फिर वह घबराकर पीछे देखती है तो
दीखता है कि राम, लक्षमण, सीता आ रहे हैं । जहाँ भी दृष्टि जाती है सती की
वहाँ राम ही राम दिखते हैं । वह इतना घबरा गई कि उनको अपनी सुध ही नहीं रह गई, वह अधीर होकर वहीं रास्ते में बैठ गई ।
पुनि पुनि हृदयँ
बिचार करि धरि सीता कर रूप ।
आगे होई चलि पंथ
तेहिं जेहिं आवत नरभूप ॥
लक्षिमण दीख
उमाकृत बेषा । चकित भये भ्रम हृदयँ बिसेसा ॥
कहि ना सकत कुछ
अति गम्भीरा । प्रभु प्रभाव जानत मतिधीरा ॥
सती कपटु जानेउ
सुरस्वामी । सबदरसी सब अंतर्जामी ॥
सुमिरति जाहि मिटइ
अग्याना । सोइ सर्बग्य रामु भगवाना ॥
सती कीन्ह चह
तहँहुँ दुराऊ । देखहु नारि सुभव प्रभाऊ ॥
निज़ माया बल हृदय
बखानी । बोले बिहसि रामु मृदु बाणी ॥
जोरि पाणि प्रभु
कीन्ह प्रणामू । पिता समेत लीन्ह निज़ नामू ॥
कहेउ बहोरि कहाँ
बृषकेतू । बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू ॥
राम बचन मृदु गूढ
सुनि उपजा अति संकोच ।
सती सभीत महेस
पहिं चली हृदय बड सोचु ॥
मै संकर कर कहा न
माना । निज़ अग्यान राम पर आना ॥
जाइ उतरु अब देहउँ
काहा । उर उपजा अति दारुन दाहा ॥
जाना राम सती दुख
पावा । निज़ प्रभाव कछु प्रगटि जनावा ॥
सती दीख कौतुक मग
जाता । आगे रामु सहित श्री भ्राता ॥
फिर चितवा पाछे
प्रभु देखा । सहित बंधु सिय सुंदर बेषा ॥
जहँ चितवहिं तहँ
प्रभु आसीना । सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना ॥
देखे सिव बिधि
बिष्नु अनेका । अमित प्रभाउ एक ते एका ॥
बंदत चरन करत
प्रभु सेवा । बिबिध बेष देखे सब देवा ॥
सती बिधात्री
इंदिरा देखी अमित अनूप ।
जेहिं जेहिं बेष
अजादि सुर तेहिं तेहि तन अनुरूप ॥
देखे जहँ तहँ
रघुपति जेते । सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते ॥
जीव चराचर जो
संसारा । देखे सकल अनेक प्रकारा ॥
पूजहिं प्रभुहिं
देव बहु बेषा । राम रूप दूसर नहिं देखा ॥
अवलोके रघुपति
बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे ॥
सोइ रघुबर सोइ
लक्षमनु सीता । देखि सती अति भई सभीता ॥
हृदय कम्प तन सुधि
कछु नाही । नयन मूदि बैठी मग माहीं ॥
शेष अगली अंक में ----
प्रभु नारायण
श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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