इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
ब्रम्ह के कर्म संविधान के पालन की चर्चा के क्रम में सरलतम
पथ के रूप में भक्ति पथ को अंगीकार करने की अनुशंसा करते हुये भक्ति पथ की
वाँक्षित अनिवार्य वाँक्षनाओं से अवगत होना आवश्यक है । प्रथम वाँक्षना होती है
साधक के मन अर्थात मस्तिष्क में आराध्य के प्रति आदरपूर्ण भाव का निवेश । यह
अत्यंत आवश्यक है कि साधक मनुष्य अपने आराध्य के प्रति अति आदर जनक भाव धारण करता
है । इसके आभाव में वह चाहते हुये भी कर्म संविधान के अनुसार कार्य आचरण नहीं
सम्पन्न कर सकेगा । आदरपूर्ण भाव के विद्यमान रहने पर ही वह कार्य को सेवा भाव से
कर सकेगा । इस वाँक्षना का कोई अपवाद नहीं है ।
दूसरी अनिवार्य वाँक्षना होती है समर्पण । साधक को आराध्य
के प्रति समर्पित होना भी परम आवश्यक होता है । समर्पित होने की दशा में ही वह
अनन्य भाव से सेवा रूप में कार्य सम्पादित
करेगा । सतत मस्तिष्क पटल पर यह विचार चमकते सूर्य की भाँति प्रकाशमान रहना चाहिये
कि आराध्य का आदेश पूर्ण करना मेरा शाश्वत कर्तब्य है ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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