शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप आत्मा का कर्म सम्पादन यदि है तो ब्रम्ह की व्यवस्था यथा नियोजित चलती रहेगी । परंतु यदि किन्ही कारणों से आत्मा का कर्म सम्पादन ब्रम्ह के कर्म संविधान के प्रतिकूल होता है तो ब्रम्ह की व्यवस्था कुप्रभावित होती है । ऐसी दशा में आत्मा के कर्म सम्पादन को सुधारने की स्थिति हो जाती है । इसी कर्म सुधार के विचार क्रम में सरलतम पथ के रूप में भक्ति को सुझाया गया है । यह सृष्टि कर्म प्रधान है । कर्म ही मानक होता है प्रत्येक मूल्यांकन हेतु । जिस मनुष्य का कर्म सही है वह ही सही कहा जावेगा । जिस मनुष्य का कर्म दोषपूर्ण होगा वह प्रत्येक मूल्यांकन में गलत ही प्रमाणित होगा । त्रुटिपूर्ण कर्म का ज्ञान होने पर उसे सुधारना ही उपाय रह जाता है उत्थान के लिये । त्रुटि का श्रोत जनित होता है सदैव प्रकृतीय माध्यमसे ही । इस निमित्त सुधार के लिये प्रकृति के प्रति सम्मानजनक भाव का निवेष अनिवार्य है । प्रकृति की कृपा के लिये निष्चय ही समर्पित होना होगा । यही भक्ति पथ है ।
शरीर के दो घटक आत्मा और प्रकृति । आत्मा तो पूर्णतया अलौकिक है । इसलिये इसे प्रकृति निर्मित शरीर से जाना नही जा सकता । परंतु प्रकृति ज्ञेय है । प्रकृति को जितना जान सकेंगे उतना ही सही आचरण सम्भव होगा । मनुष्य शरीर प्रकृति निर्मित है । प्रकृति के मध्य कार्यरत है । प्रकृति ही कार्य प्रेरक है । प्रकृति ही कार्य नियंत्र्क है । प्रकृति ही विकृति जनित करने का माध्यम है । प्रकृति ही न्याय निर्धारित करती है । सही संतुलित कार्य सम्पादन के लिये प्रकृति के प्रति निष्ठा व आदर भाव और प्रकृति की कृपा पर निर्भरता ही सरलतम पथ है । यही भक्ति मार्ग है ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

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