सोमवार, 18 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रकृति परम् ब्रम्ह की ब्यवस्था का नाम है । अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक जगत के सज्ञान के लिये प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । जहाँ तक मनुष्य की ज्ञान सीमा है वह सब प्रकृति है । समस्त स्वरूप भी प्रकृति है समस्त गतिविधि भी प्रकृति है । इसी बात को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा
      प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
मनुष्य का शरीर प्रकृति परंतु उसका अस्तित्व आत्मा यदि समस्त सृष्टि को इस रूप में देख सके कि जो कुछ भी कर्म सम्पादन हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है तो मानो वह कर्ता को साक्षात देख रहा होता है ।
उपरोक्त कथन पर्याय है अहंकार के शमन का । कोई मनुष्य कोई कार्य करके उसमें कर्तापन का जो बोध करता है उसे ही अहंकार कहा जाता है । परंतु यदि योगेश्वर का उपरोक्त कथन हृदयस्थ कर सके मनुष्य तो यह तुल्य होगा उसके अहंकार भाव के समापन के ।
परंतु युगो से विभिन्न शरीरों को संचालित करती आ रही आत्मा ज्ञान के आभाव में कर्तापन अर्थात अहंकार की सहज अभ्यासी होती है । परंतु जब ज्ञान के रूप में यह तथ्य ग्रहण किया जाय कि समस्त कर्म की कर्ता प्रकृति है दूसरे शब्दों में परम् ब्रम्ह की ब्यवस्था कर्म की कर्ता है तो निश्चय ही अहंकार को विदा लेना ही होगा । अहंकार दोषपूर्ण कर्म का प्रेरक होता है । त्याज्य होता है ।
प्रकृति और आत्मा दोनों ही अनादि काल से विद्यमान है । प्रकृति काल सीमा के अंतर्गत कार्यरत रहती है । आत्मा अजर है अमर है । इन दोनो का परस्पर ही सृष्टि का समस्त स्वरूप है । प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था का स्वरूप है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । कर्म दोनो के परस्पर की उत्पत्ति है ।
आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण अविनाशी है । इसी कारण एक शरीर जो कि प्रकृति निर्मित होता है की काल अवधि पूरा होने पर अविनाशी आत्मा ब्रम्ह की व्यवस्था द्वारा दूसरे शरीर में अंतरित की जाती है । परंतु एक शरीर में जो भी क्रिया सम्पादन आत्मा ने प्रेरित किया उसका सम्पूर्ण लेखा रहता है जिसके आधार पर उसे अगली शरीर आवंटित होती है । त्रुटिपूर्ण कर्मों का पोषण पाप के रूप में और सही कर्मो का पोषण पुण्य के रूप में लेखा में अंकित रहते है । उनका फल भोग अगली शरीर में आत्मा को भोगना होता है । पाप करने से पाप की वृद्धि होती है पुण्य करने से पुण्य की वृद्धि होती है । प्रकृति की कार्यशैली न्यायपूर्ण होती है । ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म पुण्य की श्रेणी में और कर्म संविधान के विरुद्ध कर्म सम्पादन पाप की श्रेणी में लेखाबद्ध किये जाते हैं ।

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

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