शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ....
यद्यपि माता पार्वती ने अपने संशय को प्रगट नहीं किया फिरभी प्रभु शंकर जान गये और कहने लगे कि देवी संशय न करें वह मेरे ईष्ट देव ही थे जिनकी कथा अगस्त मुनि सुना रहे थे और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को बताई थी । समस्त सिद्ध ज्ञानी मुनि उनकी सेवा में तत्पर रहते है । वेदों में उन्हे अनादि कहके बताया गया है। वह सकल ब्रम्हाण्ड के स्वामी है ।  
परंतु प्रभु शंकर के कहे बचनों से माता पार्वती को संतोष नहीं मिला । शंकर जी के सुझाव पर माता पार्वती परीक्षा लेकर पुष्ट करने को चल पडी । इसपर शंकरजी विचार करने लगे कि यह अच्छा नहीं हो रहा है परंतु संतोष किये कि जो विधि का विधान होगा वह होकर रहेगा ।
यद्यपि प्रगट न कहेऊ भवानी । हर अंतर्यामी सब जानी ॥
सुनहि सती तब नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिअ उर काऊ ॥
जासु कथा कुम्भज रिषि गाई । भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई ॥
सोई मम इष्टदेव रघुबीरा । सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहिं ध्यावहीं ।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं ॥
सोई राम ब्यापक ब्रम्ह भुवन निकाय पति माया धनी ।
अवतरेउ अपने भगत हित निज़तंत्र नित रघुकुलमनी ॥
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिव बार बहु ।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ ॥
जौ तुम्हरे मन अति संदेहु । तौ किन जाई परीक्षा लेहुँ ॥
तब लग बैठि अहँउ बटछाहीं । जब लगि तुम्ह ऐहहँ मोहि पाहीं ॥
जैसे जाइ मोह भ्रम भारी । करेहुँ सो जतनु बिबेक बिचारी ॥
चली सती सिव आयसु पाई । करहिं बिचारु करौ क्या भाई ॥
इहाँ सम्भु अस मन अनुमाना । दच्छसुता कहुँ नहि कल्याना ॥
मोरेहुँ कहे ना संसय जाहीं । बिधि बिपरीत भलाई नाहीं ॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढावै साखा ॥
अस कहि लगे जपन हरि नामा । गई सती जँह प्रभु सुखधामा ॥
शेष अगले अंक में ...   ...   ...   
  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण      
 सतत 

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