इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ... … ...
जब श्रीराम माता सीता को खोजते
शोकाकुल दशा में बन बन भटक रहे थे उसी समय भगवान शंकर ने उन्हे देखा । शंकरजी भगवान का दर्शन पाकर कृतकृत्य हो
गये मानो उनके मनोरथ पूरे हो गये । परंतु भगवान शोकाकुल दशा में थे इसलिये वह दूर से ही उन्हे प्रणाम करके अपने मार्ग चले
गये । आगे अपने पथ पर चलते जा रहे थे परंतु जब जब भगवान का दर्शन ध्यान में आ रहा
था हर्ष से पुलकित हो किलकारी उठती थी । शंकर जी कि यह दशा देख माता पार्वती के
मस्तिष्क में संदेह जाग्रित हुआ । वह तर्क करने लगी कि पतिदेव शंकरजी को सभी
प्रणाम करते है श्रेष्ठ मानते है परंतु यह क्या स्थिति हुई कि शंकरजी ने उन
राजकुमारों को प्रणाम किया और जब जब उनका स्मरण इन्हे हो रहा है हर्ष से पुलकित हो
जा रहे हैं । क्या परम्ब्रम्ह मनुष्य शरीर में हो सकते हैं ? ऐसा तो वेदों में भी नहीं वर्णित है । उनके तर्क से भगवान विष्णू भी नही हो
सकते मनुष्य शरीर में । फिर विचार आता था कि भगवान शंकर पूर्ण ज्ञाता है यह सकल
संसार जानता है इनसे तो इस प्रकार की भूल नहीं हो सकती । इस प्रकार अंतविहीन संसय में
डूब गयी ।
सम्भु समय तेहि
रामहिं देखा । उपजा हियँ अति हरष विसेषा ॥
भरि लोचन छविसिंधु
निहारी । कुसमय जान न कीन्ह चिन्हारी ॥
जय सच्चिदानंद जग
पावन । अस कहि चलेहुँ मनोज नसावन ॥
चले जात सिव सती
समेता । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥
सती सो दसा सभु कै
देखी । उर उपजा संदेहु विसेषी ॥
संकरु जगतबंधु
जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥
तिन्ह नृप सुतहिं
कीन्ह प्रणामा । कहि सच्चिदानंद परधामा ॥
भये मगन छबि तासु
बिलोकी । अजहुँ प्रीत उर रहति न रोकी ॥
ब्रम्ह जो ब्यापक
बिरज अज अकल अनीह अभेद ।
सो कि देह धरि होई
नर जाहि न जानत बेद ॥
बिष्नु जो सुरहित
नर तनु धारी । सोउ सर्बग्य यथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अग्य
इव नारी । ग्यानधाम श्रीपति असुरारी ॥
सम्भु गिरा पुनि
मृषा न होई । सिव सर्वग्य जान सबु कोई ॥
शेष अगले अंक में ... ... ...
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण
नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
सतत ... ... ... ...
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