इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं जानी जा सकती है परंतु आपकी
पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ अर्थात नाक, कान, आँख, जिह्वा, व स्पर्ष जो भी
बाह्य संसार का ज्ञान शरीर में ले आती हैं उनका भोक्ता आत्मा होती है । इस बात का
अभिप्राय यह हुआ कि यदि आपने कोई खाने की चीज़ खाई तो उसका स्वाद आत्मा ने ग्रहण
किया । इसी प्रकार कोई गंध पाने के लिये आपने सूँघा तो उसकी गंध का ज्ञान आत्मा ने
ही ग्रहण किया । इसी प्रकार अन्य तीन ज्ञानेंद्रियों के लिये भी । इस बात का सार
यह हुआ कि प्रकृति के गुणों की भोक्ता आत्मा है । जो कुछ भी आप खाते है या सूँघते
है या स्पर्ष करते हैं वह समस्त प्रकृति सृजित ही वस्तुएँ होती हैं । इसलिये उन
वस्तुओं में जो गुण निहित होते है यथा स्वाद या गंध वह उन्हे प्रकृति से ही मिले
होते हैं । चूँकि उन गुणों का ज्ञान बोध आत्मा ग्रहण करती है इसी अभिप्राय से यह
कहा जाता है कि आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता होती है ।
उपरोक्त लक्षण के सहारे अब आप अपने अंदर विराजमान आत्मा को पहचानने
व उसकी स्थिति शरीर में कहाँ है चिन्हित करने का प्रयत्न करिये । शरीर में कोई
दूसरा अवयव नहीं है जो प्रकृति के गुणों का भोग कर सके इसलिये गुणों का जो भी
अनुभव आपको मिले वह ज्ञान सीधा आपको आत्मा से ही मिलेगा ।
उपरोक्त अनुभव से आगे आत्मा प्रकृति के गुणों में आसक्ति या
विरक्ति जनित करती है । इस बात का अर्थ हुआ कि अगर आत्मा को कोई स्वाद अच्छा लगा
तो वह दोबारा उस स्वाद को पाने की इच्छा करती है । इसका विलोम भी सही है कि यदि
कोई स्वाद आत्मा को अरुचिकर लगा तो वह उसका तिरस्कार करना चाहेगी । इस प्रकार अपनी
आत्मा को पहचानने और उसकी स्थिति शरीर में चिन्हित करने में आत्मा के इस स्वभाव का
भी उपयोग करिये ।
जैसा कि मैंने शुरू में ही आग्रह किया था की ज्ञान यात्रा
मात्र सिद्धांतिक ज्ञान से नहीं सतत क्रिया सम्पादन से सम्पन्न करने से फलदायी
होगी । इसक्रम में यह पुन: निवेदन है कि जिस भजन से यात्रा शुरू की गई है उसे सतत
प्रतिदिन यथा सम्भव करते यात्रा आगे बढाते रहिये । इसी विचार से प्रतिदिन थोडा
थोडा ही यात्रा आगे बढाई जा रही है कि साथ साथ अभ्यास सम्भव हो सके । परंतु स्मरण
रहे कि जितने अभ्यास शुरू किये जाँय उन्हे प्रतिदिन ज़ारी रखते हुये अगला अभ्यास
ग्रहण किया जाय ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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