इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । इस ज्ञान यात्रा पर अग्रसर होने पर सबसे पहले इस शरीर की रचना जानना आवश्यक
है जिसके माध्यम से यह ज्ञान यात्रा करनी है । श्रीमद भागवद गीता में योगेश्वर
श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस शरीर की रचना ‘प्रकृति’ और ‘पुरूष’ दो के सन्योग से
की गई है । ‘प्रकृति’ – जहाँ तक आपकी ज्ञान सीमा है वह समस्त प्रकृति है । ‘पुरूष’ को भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अंश बताया है । प्रकृति गुणों
से युक्त है, नश्वर है, परिवर्तंशील है ।
ब्रम्ह चिर है दिब्य है शांत है परम आनंद है । कितना विचित्र समायोजन है । यही
विचित्र समायोजन उपस्थित करता है मनुष्य के जीवन में सुखों और दु:खों का समिश्रित
अनुभव ।
जैसा पूर्व के लेख में आग्रह किया गया था ज्ञान प्राप्ति के
साधक जिज्ञासुओं से कि यह मात्र सिद्धांतिक जानकारी की यात्रा नहीं अपितु कर्म पथ
से समस्त क्रियाओं का अभ्यास करते हुये दिब्य ज्ञान को पाना है । ज्ञान प्राप्ति
पर हर यात्री उस चिर दिब्य ब्रम्ह के परम आनंद को प्राप्त होगा । इसलिये विनम्र
अनुरोध है कि पूर्व में सुझाये गये भजन –
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
को जितना सम्भव हो सतत अभ्यास करते रहें । प्रतिदिन थोडे
अंश को ही इस विचार से प्रगट किया जा रहा है कि आप सहज से आत्मसात करते हुये हृदय
में इस सृष्टि के कण कण में ब्याप्त ब्रम्ह – नारायण स्वरूप को
स्थापित कर सकें ।
ज्ञान की मंजिल पर पहुँचने पर दिब्य आनंद को आप ब्यक्त
करेगें और वर्तमान लेखक श्रोता के रूप में आपके आनंद वर्णन का अमृत ग्रहण करेगा ।
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