सतत् ... ... ...
इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । आत्मा जो कि
अपरिवर्तनशील ब्रम्ह का अंश है, विश्व के प्रयोजन
की दृष्टि से नित्य कर्ता है, जो कि नित्य
वस्तु रूप के जो कि परिवर्तनशील प्रकृति का अंश है, के सब रूपों का
आधार है – के सम्मुख होता है, जबकि कर्म
सृजनशील संवेग है, गति विधि का मूल तत्व । यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
इस स्थल पर पहुँच कर जब मनुष्य शरीर के अवयव अंशो का परिचय
प्रगट हो गया है एक दृष्टांत प्रस्तुत कर रहें हैं जिसमें तीनो अवयव अर्थात आत्मा, प्रकृति, कर्म का परस्पर क्रिया पद्धति विदित होगी । वैसे तो हर
व्यक्ति प्रतिपल जीवन यापन में इस अनुभव से गुज़र रहा है परंतु ज्यादातर लोग इसे
महसूस नहीं करते । उदाहरण भगवान शंकर माता पार्वती व अवतार पुरूष भगवान राम के
परस्पर प्रसंग का है, व जैसा कि तुलसी कृत राम चरित्र मानस में वर्णित है ।
एक बार त्रेता युग में भगवान शंकर माता पार्वती के साथ
अगस्त ऋषि के आश्रम में गये । मुनि अगस्त ने उन दोनों का यथा देवता पूजन किया ।
मुनि अगस्त ने भगवान राम की कथा सुनाई । भगवान राम शिवजी के ईष्टदेव थे । इसलिये
शिव भगवान बहुत प्रसन्न हुये । ऋषि अगस्त ने भगवान शंकर से भगवान की भक्ति पूँछी ।
भगवान शंकर ने ऋषि को योग्य पात्र पाते हुये उन्हे भक्ति सुनाई। इस प्रकार भगवान
की चर्चा करते सुनते कुछ दिन भगवान शंकर मुनि अगस्त के आश्रम में निवास किये । फिर
मुनि अगस्त से विदा मांग कर भगवान शंकर माता पार्वती के संग अपने धाम कैलाश पर्वत
के लिये चल पडे ।
एक बार त्रेता युग
माहीं । सम्भु गए कुम्भज रिषि पाहीं ॥
संग सती जगजननि भवानी
। पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी ॥
राम कथा मुनिबर्ज
बखानी । सुनि महेस परम सुख मानी ॥
ऋषि पूछी हरिभगति
सुहाई । कही सम्भु अधिकारी पाई ॥
कहत सुनत रघुपति
गुण गाथा । कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ॥
मुनि सन बिदा मागि
त्रिपुरारी । चले भवन सँग दच्छकुमारी ॥
सतत् ... ... ... प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
सतत ... ... ...
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