इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । जहाँ तक दृष्टि जाती है जितने भी रूप दीखते है सब प्रकृति
है । प्रकृति की व्यापकता की सीमा नहीं है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है, ब्रम्ह की आज्ञाकारी है, मर्यादित आचरण
इसका सहज स्वरूप है । मानो अलौकिक ब्रम्ह ने अपने को लौकिक प्रकृति के रूप में
प्रदर्शित किया है । प्रकृति की कार्यशैली अति वैज्ञानिक है । इसकी समस्त रचनाये
पाँच तत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर से सृजित हुई है और प्रत्येक रचना का आयुर्बल होता है
जिसके पूरे होने पर वह रचना पुन: उन्ही पाँच तत्वों में विलीन हो जाती है । इस कथन
की पुष्टि में समस्त वनस्पतियों, एवं जीवों को
देखिये सब आयुर्बल पूरे होने पर उसी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं । इतना ही नहीं
प्रत्येक बनस्पति व जीव में प्रकृति ने उन्हें अपनी वंश परम्परा चलाने की क्षमता भी
प्रदान की है जो कि सृष्टि क्रम सतत चलते रहने का ज्ञोतक है ।
प्रकृति अत्यंत बलशाली है । वायु के तूफान, तनसुई, ज्वालामुखी, जंगल की दावाग्नि
इनकी विभीषका एवं इनमें निहित शक्ति से समस्त मानव समाज परिचित है । इसकी व्यवस्था
अति व्यापक आयाम की है । जल वृष्टि, हिमपात, नदियों में जल संचार इसकी व्यापक व्यवस्थाओ के उदाहरण है ।
प्रकृति गुणों से युक्त है । गंध, स्वाद, ध्वनि, प्राकृतिक दृष्य, सुहावने/अतिकारी मौसम सभी प्रकृति की लीला के परिचायक हैं । परंतु इतनी
उपलब्धियों के बाद भी प्रकृति पंगु होती है क्योंकि इसमें सम्पादन क्षमता नहीं
होती है । परम् ब्रम्ह ने प्रकृति में सब कुछ उपरोक्त विवरण अनुसार क्षमताए दिया
है परंतु इसमें सम्पादन क्षमता न देकर इसे अपने नियंत्रण में रखने का उपाय रखा है
।
मनुष्य शरीर की रचना के प्रसंग में, प्रकृति की उपरोत उपलब्ध क्षमताओं की चर्चा के उपरांत, अब मनुष्य शरीर में ब्रम्ह के अंश आत्मा का विचार करें । आत्मा भी ब्रम्ह का
अंश होने के कारण मनुष्य को प्रकृति निर्मित इंद्रियों की ज्ञान क्षमता के परे होता
है ।
सतत ... ... ...
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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