बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । परम ब्रम्ह को जानना ही ज्ञान है । परम ब्रम्ह को जानने का पथ भी ज्ञान कहा जाता है । ज्ञान मात्र सिद्धांत के रूप में जानने से नहीं  अपितु  कर्म सम्पादन द्वारा  अर्जित हो सकेगा । जिस प्रकार सूर्य को देखने के लिये किसी अन्य प्रकाश श्रोत की आवश्यकता नहीं होती है उसी प्रकार ज्ञान पाने के लिये किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है । कर्म जो नित्य प्रतिदिन  सम्पादित  कर रहे हैं, चाहे वह वृत्ति के निमित्त है अथवा  पारिवारिक  दायित्व  के निमित्त है  अथवा  शरीर के पोषण के लिये है अथवा सामाजिक दायित्व से सम्बंधित है, उन्ही कर्मों की सम्पादन  पद्धति और सम्पादन के निमित्त मानसिकता की गुणवत्ता में परिवर्तन  करने से होगा ।   ज्ञान  अर्जित  करने के लिये अलग से कोई  विषेस कर्म करने की वाँक्षना नहीं होगी । 
उपलब्धि साधक की निष्ठा के अनुपात में ही सम्भव हो सकती है । धर्म दर्शन के ग्रंथों में हृदय शब्द का अर्थ मस्तिष्क में धारणाओं को ग्रहण करने का केंद्र ( conceptual center of mind) के अर्थ में किया जाता है । ज्ञान  यात्रा हृदयस्त कर सम्पादित करने के लिये दृढप्रतिज्ञ निष्ठावन साधक सफलता अवश्यमेव पाते हैं । 
सतत ...  ...  ...   

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