सतत् .... .... ....
इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को
जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा
जाता है । मनुष्य शरीर की रचना में प्रयुक्त दोनो ही अवयव प्रकृति और आत्मा का संक्षिप्त
परिचय प्रस्तुत करने के उपरांत अब श्रीमद भागवद् गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
इस रचना को बताया है –
अक्षरँ ब्रम्ह परमं
स्वभावोअध्यात्म्मुच्यते ।
भूत्भावोद्भवकरो विसर्ग :
कर्मसज्ञित: ॥
ब्रम्ह
अपरिवर्तंशील स्वत: अस्तित्व है जिसपर वह सभी वस्तुयें जो जीती हैं गति करती हैं और
जिनका अस्तित्व हैं - वह आधारित हैं । आत्मा ब्रम्ह का अंश है जो कि प्रकृति में
विद्यमान है । कर्म वह सृजनशील संवेग है, जिससे जीवन के
रूप उद्घृत होते हैं । सृष्टि का समूचा विकास कर्म से है । कर्म का उद्भव ब्रम्ह
से है, इसलिये कोई कारण नहीं कि आत्मा उसमें भाग ना ले । आत्मा जो
कि अपरिवर्तनशील ब्रम्ह का अंश है, विश्व के प्रयोजन
की दृष्टि से नित्य कर्ता है, जो कि नित्य वस्तु
रूप के जो कि परिवर्तनशील प्रकृति का अंश है, के सब रूपों का
आधार है – के सम्मुख होता है, जबकि कर्म
सृजनशील संवेग है, गति विधि का मूल तत्व । यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । कर्ता और वस्तु रूप की परस्पर
क्रिया ही सृष्टि का केंद्रीय आदर्श है, ब्रम्ह की
अभिव्यक्ति हैं, जो कि कर्ता और प्रकृति के भेद से परे है ।
ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप आत्मा, प्रकृति व कर्म । जितना ही यह आत्मसात हो सकेगा उतना ही आगे की चर्चा हृदयस्त
हो सकेगी । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया । कर्म के रूप में
ब्रम्ह ने अपने को प्रगट करके संदेश दिया है हर प्रकृति रूप को जीने का । तीनो ही
महत्वपूर्ण हैं । उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है तीनों के भेद को अंतर को आत्मसात
करना । ब्रम्ह अपरिवर्तनशील स्वत: अस्तित्व है, प्रकृति ब्रम्ह
की अभिव्यक्ति है परवर्तनशील है, कर्म सृजनशील
संवेग है – ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । आत्मा और प्रकृति की परस्पर
क्रिया ही सृष्टि का स्वरूप है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
सतत ... ... ...
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