बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: ...     ... 
उसी समय भगवान ने सूर्यवंशी राजा रघु के कुल में अवतार लिया था और पिता की आज्ञा का पालन करते हुये दण्डक बन में बनबास करते बिचर रहे थे । यह बात भगवान शंकर, विष्णु, ब्रम्हा को तो पता थी परंतु माता पार्वती नहीं जानती थी। उधर बनबास काल में राक्षस रावण ने छल करके माता सीता को जब वे अकेले थी  उनके आश्रम से हर ले गया । भगवान राम जब आश्रम वापस आये और माता सीता को अनुपस्थित पाकर उनके वियोग में विह्वल हो गये । दोनों भाई शोकाकुल दशा में बन बन भटक रहे थे माता सीता की खोज़ में ।  
तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥
पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥
हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होई ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोई ॥
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोई ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची ॥
रावन मरन मनुज कर जाचा । प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥ 
जौ नहिं जाँहु रहै पछतावा । करत विचार न बनत बनावा ॥
एहि विधि भए सोचबस ईसा । तेहि समय जाय दससीसा ॥
लीन्ह नीच मारीचहिं संगा । भयहु तुरत सोइ कपट कुरंगा ॥
करि छल मूढ हरी बैदेही । प्रभु प्रभाव तस बिदित न तेही ॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए । आश्रमु देखि नयन जल छाये ॥
बिरह विकल नर इव रघुराई । खोजत बिपिन फिरत द्वौ भाई ॥
कबहूँ जोग बियोग न जाके । देखा प्रगट बिरह दुख ताके ॥
अति विचित्र रघुपति चरित जानहि परम सुजान ।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कुछ आन ॥
शेष आगे के अंक में ...   ...   ... 

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण       सतत ...   ...   ...   ...

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