इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
तैत्रेय उपनिषद में वर्णित है कि वर्तमान सृष्टि की समस्त रचनाये पाँच स्तर में
विभक्त की जा सकती हैं । (1) अन्न (2) प्राण (3) मनस (4) विज्ञान (5) आनंद । मनुष्य
चतुर्थ श्रेणी ‘विज्ञान’ में
वर्गीकृत किया जाता है । इस प्रकार इसे पाँचवी श्रेणी ‘आनंद’ अभी प्राप्त होना शेष है । इस आनंद की स्थिति को प्राप्त करने के लिये कर्म
संस्कार ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुकूल होना अनिवार्य वाँक्षना है । गत अनेक अंको
से इस लेख स्तम्भ में सतत इसी कर्म संविधान के आचरण में व्यव्हृत की जा रही त्रुटियाँ
तथा उनके निवारण के उपाय की चर्चा की जा रही है । यह भी सतत स्मरणीय है कि ज्ञान केवल
सिद्धांत रूप में जानने के लिये नहीं है अपितु इसे नित्य प्रतिदिन के जीवन यापन में
अपने आचरण में अंगीकार करने से उपलब्धि सम्भव होगी । लक्ष्य उस आनंद की स्थिति को अपने
जीवन में अनुभूति करने और उससे भी आगे उस आनंद की स्थिति में सतत जीवन यापन करना है
। यही होगा ब्रम्ह की दिव्य शांत आनंद में समाहित हो जाना । प्रत्येक मनुष्य उस दिव्य
शांति के आनंदमय ब्रम्ह को पा सकता है, उसमें समाहित हो सकता है । मात्र दृढ प्रतिज्ञ
हो ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप आचरण करने की वाँक्षना है । इस संसार में व्याप्त
समस्त सुख और दु:ख की स्थिति से मुक्त हो जावेंगे । मात्र प्रकृति के अनन्य सेवक बनकर
अपनी इच्छाओं और अहंकार को काबू करना होगा । इसके लिये पथ दर्शाये जा सकते हैं परंतु
साधना जो करेगा आनंद फल उसे ही मिलेगा । इस पथ की यात्रा में सबसे बडा शत्रु हमारे
अपने अंदर ही विद्यमान रहकर हमारी यात्रा के उद्देष्य को खण्डित करता है । हमारी इच्छायें
तथा हमारा अहंकार ही हमारा महान शत्रु है जो हमें आनंद की दिव्य स्थिति से दूर किये
रखता है । यदि दिव्य आनंद को पाना है महसूस करना है उस आनंद में जीवन जीना है तो अपने
अंत:करण में मौजूद अपने शत्रु अपनी इच्छाओं और कर्तापन के अहंकार को निर्मूल करना होगा
। उस दिव्य आनंद को बताने से कभी भी जाना नहीं जा सकता । उसे तभी जान सकेंगे जब उसे
स्वयँ अनुभव करेगें । यह ध्रुव सत्य है कि यदि कंचिद एक पल मात्र भी उस आनद को अनुभव
कर सके तो फिर लौट कर इस सुख दु:ख की ओर नहीं आयेगे । वह वास्तविक दिव्य स्थिति है
। उसे पाकर ही जाना जा सकता है । पाने का एक मात्र उपाय है ब्रम्ह के कर्म संविधान
के अनुरूप आचरण अर्थात प्रकृति के कर्तापन को स्वीकार करना । इस साधना का सरलतम उपाय
है प्रकृति के प्रति समर्पण ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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