गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया
कि जिस मनुष्य की आत्मा समस्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाती है वह आवा-गवन
अर्थात जन्म-मृत्य के इस समुद्र से मुक्त करदी जाती है और परम् ब्रम्ह के स्वरूप
में विलीन हो जाती है ।
आत्मा जो कि परम् ब्रम्ह का ही अंश
होती है । उसे प्रकृति के मध्य रखने का प्रयोजन होता है । प्रकृति के प्रयोजनों की
पूर्ति ही लक्ष्य होता है । इस लक्ष्य को प्राप्त करना आदर्श आचरण होता है । आत्मा
प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होकर इस लक्ष्य को पाने से च्युत होती है । यह विक्षेप ही
उसको इस शरीर उस शरीर की यात्रा का निमित्त बनता है । इसलिये जो आत्मा प्रकृतीय
मोंह से मुक्त होगी उसे आवागवन से मुक्ति मिलेगी । परम् ब्रम्ह के शाश्वत् पद में
स्थान मिलेगा । वह चिर दिव्य शांति का भोग करेगा ।
समस्त अशांति का मूल विक्षेप है ।
प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होना है । स्मरणीय है कि मूल स्वरूप में आत्मा ब्रम्ह की
गरिमा से युक्त होता है । विक्षेप उसकी विकृति है । विकार से मुक्ति ही उसे पुन:
श्रीपद में स्थान दिलाने वाला है । कर्म साधन है ।
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