ब्रम्ह का
निष्कलंक, निरंजन स्वरूप । कलंक होता है पाप
। धर्म का निर्वाह ना करना पाप । अपेक्षित आचरण धर्म । निष्कलंक होना है पाप से
रहित होना । जिसका समस्त आचरण धर्मवत् होवे । जिसका समस्त आचरण अपेक्षानुरूप होवे
। निरंजन । प्रकृति से अछूता । प्रकृतीय मोंह से रहित । प्रकृतीय मोंह से मुक्त ।
यह स्वरूप है ब्रम्ह का । अपनी आत्मा में ब्रम्ह स्वरूप का बोध । प्रत्येक प्राणी
में निहित आत्मा में निष्कलंक, निरंजन ब्रम्ह का दर्शन । समदर्शी
। समदर्शी होगा प्रकृतीय मोंह से मुक्त ।
कार्य को करते
हुये कार्य के परिणाम से सम्बंध ना रखना । सन्यास । सन्यासी होगा प्रकृतीय मोंह से
मुक्त । कार्य करते हुये मस्तिष्क की दशा । कार्य के परिनाम से सम्बंध ना रखने
वाली । ऐसी दशा का धारक । सन्यासी ।
कार्य के परिणाम
से ना प्रभावित होने वाला । योगी । मस्तिष्क की दशा जिसमें कार्य के कर्ता के
मस्तिष्क पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पहुँचे । योग । कार्य करने का निमित्त
स्वयँ कार्य ही होवे । योग । कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से सम्बंध ना होवे ।
योग । सन्यास । योगी ही सन्यासी होता है । केवल एक ही कर्म की क्रियाकाल में अलग
अलग समय पर स्थितियाँ है ।
हमारे आपके अंदर
विद्यमान आत्मा । अपनी आत्मा का बोध । अपनी आत्मा में ब्रम्ह के निष्कलंक, निरंजन स्वरूप का बोध । प्रत्येक प्राणी में
विद्यमान आत्मा में निष्कलंक, निरंजन ब्रम्ह का दर्शन । समदर्शी
। यह सभी स्थितियाँ प्रगट करती हैं प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । मोक्ष ।
मोक्ष का साकार
स्वरूप इसी जीवन को जीते हुये पाना ही एकमात्र सार्थक प्रयत्न होगा । मोक्ष की
कल्पना जीवन के उपरांत करना एक भ्रम मात्र । जीवन जीते मोक्ष पाना । जीवन जीते
प्रकृतीय मोंह से मुक्त होना । ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप जीवन जीना । यही योग्यतम
लक्ष्य हैं जीवन जीने हेतु । चिर दिव्य शांत जीवन की कल्पना । कलह से मुक्त ।
द्वेष से मुक्त । द्वंद रहित । इन समस्त उपलब्धियों की एकाकी वाँक्षना । प्रकृतीय
मोह से मुक्ति ।
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