मस्तिष्क की दशा
का नियंत्रण । कर्ता स्वरूप की धारणा । यह दो प्रधान उपलब्धियाँ हासिल करने वाला
कर्मयोगी । मस्तिष्क जो कि अनुकूल परिणामों के उपलब्ध होने पर हर्ष का अनुभव ना
करे । मस्तिष्क जो कि विपरीत परिणामों के उपस्थित होने पर दु:ख का अनुभव ना करे ।
मस्तिष्क की उपरोक्त दोनों ही दशाये नामत: अनुकूल परिणाम मिलने पर हर्षित होना तथा
विपरीत परिणाम उपस्थित होने पर दु:खी होना हर प्रत्येक मनुष्य के लिये सामान्य
दशायें होती हैं । परंतु मस्तिष्क की दशा जिसमें अनुकूल परिणाम से हर्ष ना हो तथा
विपरीत परिणाम से दु:ख ना हो यह विषेस प्रयत्नों द्वारा ही हासिल हो सकती है । यही
मस्तिष्क की दशा उत्पन्न कर कार्य करने वाला कर्मयोगी ।
कर्मयोगी की
मस्तिष्क की दशा हासिल करने के लिये अनिवार्य वाँक्षना होती है कि मस्तिष्क
पूर्णरूप से प्रकृति के कर्ता स्वरूप को धारण कर सके । समस्त कर्मों की कर्ता
प्रकृति है । यह स्वरूप जिस मस्तिष्क में स्थापित हो जावेगा वही हासिल कर सकेगा वह
दशा जिसमें कार्य के अनुकूल परिणाम से हर्ष का अनुभव ना होवे तथा कार्य के विपरीत
परिणाम से दु:ख ना होवे । यह कर्ता स्वरूप धारण करने वाला ही ईश्वर के अस्तित्व का
सवच्छ स्पष्ट रूप का दृष्टा होता है । वही ईश्वर के रूप में विभोर जीवन जीता है ।
ऐसे व्यक्ति का मस्तिष्क कभी भी किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की क्षवि से विचलित
नहीं होता है । ईश्वर की उपरोक्त छवि का दर्शन पाने वाला उसी छवि में विलीन होकर
अपना जीवन जीता है । ईश्वर के उसी छवि में समा जाता है ।
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