रविवार, 13 अप्रैल 2014

निर्गुण सगुण

ब्रम्ह चिर दिव्य शांत स्वत: अस्तित्व है जो कि पूर्णतया अलौकिक है । इसे लौकिक जगत के ज्ञेय मानको से जाना नहीं जा सकता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है । रचना है । यह गुणों से युक्त है । ज्ञान के लिये सुलभ है । यही मनुष्य के लिये ज्ञेय सीमा भी है ।
योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करने का सुझाव । कर्मयोग । यह सगुण प्रकृति की सेवा का ही सुझाव है ।
इसी प्रकृति को ही ब्रम्ह का साकार रूप मान ब्रम्ह की ही सेवा का भाव संजो कार्य में तत्पर होना ही सगुण उपासना है ।

चारो वेद इसी सगुण ब्रम्ह की अस्तूति गाते हैं । 

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