ब्रम्ह चिर दिव्य शांत स्वत:
अस्तित्व है जो कि पूर्णतया अलौकिक है । इसे लौकिक जगत के ज्ञेय मानको से जाना
नहीं जा सकता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है । रचना
है । यह गुणों से युक्त है । ज्ञान के लिये सुलभ है । यही मनुष्य के लिये ज्ञेय
सीमा भी है ।
योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य
करने का सुझाव । कर्मयोग । यह सगुण प्रकृति की सेवा का ही सुझाव है ।
इसी प्रकृति को ही ब्रम्ह का साकार
रूप मान ब्रम्ह की ही सेवा का भाव संजो कार्य में तत्पर होना ही सगुण उपासना है ।
चारो वेद इसी सगुण ब्रम्ह की
अस्तूति गाते हैं ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें