शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रकृति विज्ञान

परम् ब्रम्ह ने प्रकृति के रूप में अपने विज्ञान को प्रगट किया है । इस विज्ञान की महिमा कि यह मानों निर्गुण निर्विकार ब्रम्ह को जैसे प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा कि जैसे यह कर्ता ब्रम्ह की कर्ता क्षमता को मानो प्रगट करता है । इस विज्ञान की महिमा की यह प्रकृति सृजन क्षमता, पालन क्षमता, तथा संहार की क्षमता से युक्त है । इस विज्ञान की अद्भुद क्षमता कि यह प्रकृति अपने अंदर संजोये हुये है वह क्षमता कि यह समस्त भोगों की स्वयँ भोक्ता भी है, समस्त आहुँतियों की ग्रहणकर्ता भी है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस मनुष्य को परम् ब्रम्ह के उप्रोक्त वर्णित प्रकृत विज्ञान का स्वच्छ स्वरूप दर्शन हो जाता है वह फिर अपने कर्तापन के अहंकार को मिटा ब्रम्ह की अनुभूति में ब्रम्ह की गरिमा में विलीन हो जाता है ।
इस सृष्टि में जो कुछ भी कर्म हो रहा है वह समस्त ब्रम्ह स्वयं अपने ही कर रहा है । यह प्रकृति के रूप में फैला हुआ उसका अद्बुद विज्ञान कर रहा है । ब्रम्ह ने इस विस्तृत प्रकृति की व्यापक विज्ञान क्षमता को प्रगट करने के लिये ही अपने ही अंश आत्मा को इस प्रकृति के मध्य भ्रमित होते व्यक्त किया है । जो आत्माधारक इस सत्य को अनुभव कर अपने को इस प्रकृति की कृपा के लिये प्रकृति को अर्पित कर देता है उसे प्रकृति विषेस कृपा स्वीकृत करते हुये उसके मित्र के रूप में, उसके गुरू के रूप में, उसके माता-पिता के रूप में, उसके हितैषी के रूप में उसे रक्षा कवच भी प्रदान करती है । परंतु यह समस्त कृपा उसे एक ही दशा में प्रकृति प्रदान करती है जब वह अपने प्रकृतीय मोंह रूपी व्याधि से मुक्त होने के लिये सचेष्ट होने में प्रकृति से याचना करता है । याचना भी पूर्णसमर्पण द्वारा ।

इस व्यापक प्रकृति में ब्रम्ह का व्यापक विज्ञान पिरोया है । यह दोष सृजन भी करती है । दोष का निवारण भी करती है । यह मोंहमें नचाती भी है । उबारती भी है । इससे संघर्ष करके कोई पार नहीं पा सकता । इससे पार पाने का एक ही उपाय है इसकी कृपा । जो महात्मा इसकी कृपा का पात्र बनजाता है उसे इसकी कृपा के प्रभाव से उपरोक्त विज्ञान भी विदित हो जाता है और प्रकृतीय मोंह की व्याधि से मुक्ति भी पाता है । परिणामत: वह ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करता है । यह व्यापक प्रकृति समस्त सृष्टि की शासक है । धारक है । नियंत्रक है । मित्र भी है । गुरू भी है । माता-पिता भी है । शत्रु भी है । कृपालु होने पर सहायक भी है । यह समस्त रूप ब्रम्ह के विज्ञान की महिमा के प्रभाव से उसमें हैं । ब्रम्ह के इस व्यापक विज्ञान के कृपापात्र बन इसकी कृपा के माध्यम से ब्रम्हनिर्वाण की स्थिति का भोग करें । यह योग्य मत है । 

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