निर्गुण ब्रम्ह का स्वरूप जाना नही
जा सकता । उसके स्वरूप की कोई कल्पना नहीं की जा सकती । क्योंकि वह पूर्ण रूप से
अलौकिक स्वत: अस्तित्व है । उसे जानने के समस्त उपलब्ध साधन लौकिक जगत के हैं ।
ऐसे में जब निर्गुण ब्रम्ह की आराधना करने का या ध्यान करने का अथवा उसके प्रति
समर्पित होने का लक्ष्य मस्तिष्क में धारण कर कोई प्रयत्नशील होता है तो उसके
सामने सबसे पहली और ज़टिल समस्या यह उपस्थित होती है कि वह कौन सा रूप मस्तिष्क में
धारण करके उसकी आराधना करे या उसका ध्यान करे अथवा उसके प्रति समर्पित होवे । आम
अभ्यास यह होता है कि किसी की आराधना करने या ध्यान करने अथवा उसके प्रति समर्पित
होने के लिये उसके रूप की कोई छवि मस्तिष्क में होनी चाहिये ।
उपरोक्त के विपरीत निर्गुण ब्रम्ह
के प्रकृतीय स्वरूप अर्थात सगुण ब्रम्ह की आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति अपने
को समर्पित करने की दशा में साधक के सम्मुख मस्तिष्क में धारण करने के लिये एक
निष्चित स्वरूप की छवि उपलब्ध होती है । इसलिये तुलनात्मक रूप से यह सुगम होता है
। सगुण ब्रम्ह को जीव के प्रति करुणामय, दयामय, वात्सल्य भाव, रक्षक भाव के विभिन्न स्वरूपों में बताया जाता है ।
तद्नुसार उसकी अनेको छवियाँ प्रचलित की गई हैं । इसलिये साधक को सगुण ब्रम्ह की
आराधना या ध्यान अथवा उसके प्रति समर्पित होना आसान लक्ष्य होता है ।
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