मनुष्य को जैसे
जैसे प्रकृति की व्यापक शक्ति, अथवा प्रकृति की क्षणभंगुरता, अथवा अपने भ्रामक अहंकार का बोध होता है वैसे वैसे
वह विनयशील होता जाता है । यह बात उसी प्रकार की है जिस प्रकार मोमबत्ती जलाने पर
अंधकार की व्यापकता का बोध होता है । उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके अज्ञान का
विस्तार उसके ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है । यही अनुभूति भक्ति के रूप
में प्रगट होती है । भक्ति का जन्म ही होता है जब मनुष्य को यह अनुभूति व्याप्त
होती है कि उसकी सक्षमता कहीं ज्यादा तुच्छ है तुलना में उसके आराध्य की शक्ति की
अपेक्षा । उसके भ्रामक अहंकार का मर्दन होता है
वास्तविक भेद
होता है ब्रम्ह और प्रकृति के मध्य । प्रकृति का अस्तित्व काल की सीमा से परिभाषित
होता है । इसीलिये भ्रामक होता है । इसके विपरीत ब्रम्ह का स्वरूप चिर होता है
दिव्य होता है । यही भेद जब सत्य रूप में ग्राह्य हो जाता है तभी उसे भ्रामक
अहंकार की अनुभूति होती है । विविधता प्रकृतीय स्वरूपों में होती है । मूल ब्रम्ह
तो प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में एक ही उभयनिष्ठ स्वरूप में विद्यमान होता है ।
जिस मनुष्य को यह भेद का विज्ञान स्पष्ट रूप में विदित हो जाता है उसे प्रत्येक
प्रकृतीय स्वरूप में एक अविनाशी ब्रम्ह के रूप का दर्शन होने लगता है । ऐसा मनुष्य
ही समदर्शी होता है । मूल ब्रम्ह का दर्शन प्रत्येक प्रकृतीय स्वरूप में । प्रत्येक
प्रकृतीय स्वरूप में प्रगट होने वाला भेद प्रकृतीय रचना के क्षेत्र का होता है ।
मूल ब्रम्ह का स्वरूप प्रत्येक प्रकृतीय रूप में एक ही होता है । यह विदित होना
ज्ञान है ।
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