शनिवार, 8 मार्च 2014

आचरण

जो मनुष्य पापों पर विजय कर चुका है और जिसका जीवन सुख और दु:ख के द्वैत से मुक्त हो चुका है वह ब्रम्ह की शांति का अनुभव पाता है । इच्छाजनित कार्यों को करना पाप की श्रेणी का होता है । कर्तापन का अहंकार करना पाप की श्रेणी का होता है । जो मनुष्य इन दोनों से मुक्त हो जाता है वह शांति की अनुभूति करता है । ऐसा मनुष्य ही समस्त जीव श्रेणी को ईश्वर के प्रतिनिधि रूप में देखता है । ऐसा मनुष्य ही दुराचरणी एवं अपराधी को भी सहानुभूति पूर्वक देखता है ।

धर्म व्यक्तिगत एक मनुष्य के उत्थान के स्वाथ साथ सामाजिक उत्थान के लिये भी मार्ग प्रशस्थ करता है । उपरोक्त वर्णित पाप से रहित मनुष्य के लिये बताया जाता है कि वह सामाजिक उत्थान के लिये सेवा करता है । किसी अन्य के उत्थान के विचार में आवश्यक नहीं कि उसके जीवन स्तर को उठाने के लिये प्रयत्न किये जांय । अगले को आत्मा और उसकी प्रकृति का ज्ञान कराना बोध कराना उसका उत्थान करने के समान होता है । इससे उसे शांति मिलती है और सामाजिक सद्भाव में वृद्धि होती है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें