फल की अभिलाषा
से किया जाने वाला कर्म । योग की अनुशंसा का उलंघन । दु:खों को निमंत्रण देने के
समान होता है । फल की कामना जनित ही होगी यदि कंचिद कार्य इच्छा के क्षेत्र से है
। योग की अनुशंसा के अनुसार कार्य प्रकृति द्वारा आदेशित एवँ अपेक्षित होना चाहिये
। यह लक्षण के रूप में बताया गया । लक्षण जो कि दूर से ही दीख जाने वाला होता है ।
मूल तलाश होती है इच्छा की । कार्य इच्छा की पूर्ति में किया जा रहा है अथवा
प्रकृति द्वारा आदेशित है । इस परीक्षण के काल में दूर से ही लक्षण प्रगट होता है
। कार्य करने वाले कर्ता को फल के लिये काफी व्यग्र देखा जा रहा है । तलाश पूर्ण
हुई । निर्विवादित रूप से कार्य इच्छा के क्षेत्र से है ।
धर्म दर्शन में
जो भी पथ किसी उपलब्धि के लिये सुझाये गये हैं उन प्रत्येक में उन सुझाओं को अमल
करने की विधि भी बतायी गयी है । योग बताया योगेश्वर श्रीकृष्ण ने । फिर उसे व्यवहारिक
जीवन में चरितार्थ करने की विधि बतायी । साधना काल में अपने प्रयत्नों का परीक्षण
कर उपलब्धि परीक्षित करने के लिये लक्षण बताये । कहा कि साधना काल में यदि
मस्तिष्क में कार्य के फल की कामना विद्यमान है तो निष्चय ही कार्य इच्छा के
क्षेत्र से है । साधक जब तक अपने प्रयत्नों की गुणवत्ता से भिज्ञ नहीं होगा वह
सार्थक उपलब्धि नही कर सकेगा ।
योग के लिये
प्रयत्नशील साधक के लिये यह एक सरलतम परीक्षण लक्षण बताया । कार्य काल में कर्ता
व्यक्ति के मस्तिष्क में कार्य के फल की लिप्सा । योगाभ्यास के साधक के लिये यह एक
लक्ष्य भी है । कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम की अभिलाषा विद्यमान
ना होना । जब साधक यह स्थिति उपलब्ध कर ले तो वह योग के सन्निकट है ।
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