मनुष्य का
मस्तिष्क जो कि एक प्रकृतीय रचना है और समस्त इंद्रियों के कार्य संचालन नियंत्रण
का केंद्र है । यह मस्तिष्क अपनी कार्य प्रणाली के विज्ञान द्वारा मनुष्य को अच्छे
बुरे कार्यों में प्रवृत्त करता है । इन्ही कारणों से योग की मस्तिष्क की अवस्था
का जो भी वृतांत प्रस्तुत किया गया है उसमें समस्त सुझाव इसी मस्तिष्क के मर्यादित
व नियंत्रित प्रयोग के लिये सारी अनुशंसाये की गई हैं । मनुष्य के कर्म को यथा
वाँक्षित से विचलित पर्यंत जो भी भटकाव उत्पन्न होते हैं उनके कारणों का शोध करने
पर यह पाया गया कि मस्तिष्क में व्याप्त फल की इच्छायें और कर्तापन का अहंकार ये
दो अवयव सर्वाधिक निमित्त प्रमाणित होते है । इन्ही कारणों से त्रुटिपूर्ण कर्मों
के सुधार के विचार में जो भी अनुशंसाये की गई हैं वह इच्छाओं के शमन और कर्तापन के
अहंकार के मर्दन को लक्ष्य करके ही की गई है ।
योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मनुष्य अपने कर्म में सम्मलित होने वाले समस्त अंगों यथा इंद्रियाँ
मस्तिष्क हृदय को यंत्रवत् प्रयोग कर सके अर्थात किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से
रहित वह मनुष्य जो भी कर्म करेगा वह पाप रहित होगा । इच्छाये पूर्वाग्रह के रूप
में ही विद्यमान रहती हैं । इसी लक्ष्य को पाने के लिये योग की अवस्था में कार्य
का अभ्यास । इन समस्त प्रयत्नों का फल होता है आत्मा का शुद्धिकरण । कर्म सुधार ।
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