कर्मफल की इच्छा
ना रखते हुये कर्म करना – सन्यास है । यद्यपि कि इसे
कर्मयोग के समान ही फलप्रद बताया गया है । परंतु सन्यास बिना सफल कर्मयोगी बने
हासिल नहीं किया जा सकता । इसा प्रकार प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से
मुक्त कराने के प्रयत्नों में योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास मूल वाँक्षना
है । योग की मस्तिष्क की दशा सतत् उपलब्ध रहे इसके लिये मस्तिष्क और विवेक में
प्रकृति के कर्ता स्वरूप का स्वक्ष चित्र उपस्थित रहे और इस स्वरूप के प्रति पूर्ण
निष्ठा विद्यमान रहे । यह क्रम है जिसमें आत्मा के उत्थान अर्थात प्रकृतीय मोंह से
ग्रसित आत्मा को ग्रसित करने वाली व्याधि मोंह से मुक्त कराने के प्रयत्नों को
करने से सफलता मिलेगी । आत्मा को मोंह से मुक्त कराने का परिणाम होगा दिव्य शांति
आनंद की उपलब्धि ।
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