बुधवार, 19 मार्च 2014

योगी सन्यासी

सच्चा सन्यासी वह है जो हर प्रत्येक कार्य को बिना फल की आकाँक्षा के करता है । सच्चा कर्म वह है जिसमें कर्म करने की आसक्ति ना होवे ।
योग की अवस्था में कार्य को करने का अभ्यास व सन्यासी दोनों ही एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये दो रास्ते है । दोनों ही मस्तिष्क की एक विषेस दशा है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य के परिणाम से कोई प्रभाव ना पडे योग है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य को करते हुये कार्य के परिणाम की कोई आकाँक्षा ना रहे सन्यास है । एक ही कार्य को एक मूर्ख और एक ज्ञानी दोनों करते हैं । बाह्य शरीर के अंगों की कार्य में भागीदारी दोनों ही की एक समान होती है । अंतर दोनों के मस्तिष्क की दशा का होता है । ज्ञानी उसी कार्य को कार्य है कार्य करने के लिये हमारा जन्म हुआ है इसलिये कार्य करेगा । मूर्ख उसी कार्य को अपने मस्तिष्क में विद्यमान किसी इच्छा की पूर्ति के लिये करेगा ।

कार्य की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु बिना आत्मा के सम्मलित हुये कोई कार्य सम्भव ही नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा नित्य कर्ता है । यह चित्र जितना ही स्वच्छ रूप से मस्तिष्क में जो धारण कर सकेगा वही धारक योगी होगा वही धारक सन्यासी होगा । योगी अथवा सन्यासी यह संज्ञाये एक निष्ठावान चरित्रवान शिष्ट आचरण वाले मनुष्य के लिये है । एक कर्मनिष्ठ को प्रदान की जाने वाली उपाधियाँ हैं । 

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