मंगलवार, 18 मार्च 2014

सन्यास

कार्य करते हुये कार्य के परिणाम से लिप्सा ना रखना सन्यास । कार्य को योग की अवस्था में मस्तिष्क को रखते हुये करना कर्मयोग । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा को मोंह से मुक्ति दिला उसे अपने ब्रम्ह स्वरूप में वापस स्थापित करने के प्रयत्नों में । यह दोनो ही एक ही समान फल पैदा करते हैं । आत्मा जो कि ब्रम्ह का अंश होता है । प्रकृतीय संसर्ग में रहते और प्रकृतीय गुणों का भोग करते वह प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । कर्म की उत्पत्ति आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया द्वारा होती है । प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा द्वारा सृजित कर्म दोषपूर्ण हो जाते हैं । कर्म दोष के निवारण के विचार में कर्मों को करते हुये कर्मदोष का निवारण पथ कर्मयोग सन्यास । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें