जो मनुष्य अपने
अंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति में हर्षित रहता है । ऐसा योगी परम् ब्रम्ह की
दिव्य शांति की स्थिति को प्राप्त होता है ।
आत्मा जो समस्त
कर्मों का प्रेरक होता है । आत्मा जो कि समस्त प्रकृतीय गुणों का भोक्ता होता है ।
आत्मा जो कि प्रकृतीय गुणों में आसक्ति जनित करता है । आत्मा जो कि प्रकृतीय मोंह
जनित करता है । ऐसी आत्मा की अनुभूति अपने अंत:करण में करना । आत्मा के वास्तविक
स्वरूप को जानना है । आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानना उसके अवाँक्षित चरित्र से
उसे उबारना है । यह समस्त अनुभव किया जा सकता है । इन समस्त को भौतिक स्वरूप में
जाना नहीं जा सकता । विदित है कि उपरोक्त कथन प्रत्यक्ष रूप से चिंतनशील जीवन शैली
की अनुशंसा है । चिंन्तनशील पर्याय है विवेक पर आधारित जीवन यापन का ।
अप्रत्यक्षरूप से यह कहना है कि जो व्यक्ति प्रकृतीय मोह और आसक्ति से परे विवेक
पर आधारित उचित और अनुचित का भेद मस्तिष्क में धारण किये हुये उचित कर्मों को
प्रेरित करते हुये जीवन यापन करता है वह परम् ब्रम्ह की चिर शांत स्थिति को पाता
है ।
उपरोक्त समस्त
कथन नकारात्मक निर्देश है प्रकृतीय मोंह के प्रति । शांति जो कि द्योतक होती है
विवेक पूर्ण कर्मों को करने हेतु । सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी । इस उपलब्धि
को वह मनुष्य अर्जित कर सकेगा जो अपनेअंदर विद्यमान आत्मा की अनुभूति प्रतिपल करते
हुये उसी आत्मा की अनुभूति में हर्षित रहेगा । उसके कर्म बंधनकारी नहीं रह जावेगें
। मुक्त आत्मा से प्रेरित कर्म मोक्षदायक होते है । मोक्ष – आत्मा की आसक्ति से मुक्ति है – मोक्ष । मोक्ष ही दिव्य शांति है ।
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