शुक्रवार, 21 मार्च 2014

दागी कर्म

कर्म जिन्हे करते हुये मस्तिष्क में किसी फल विषेस की कामना विद्यमान रहे वे कर्म आत्मा को प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त करने वाले होते हैं । ऐसे कर्म सत्कर्म नहीं कहे जावेंगे । इन्हे करने से आसक्ति की वृद्धि होती है । सच्चा कर्म वह होता है जिसे करते हुये मस्तिष्क में कर्म के फल के प्रति लिप्सा ना विद्यमान रहे । योगावस्था में किये जाने वाले कर्मों के विचार में भी सत्कर्म का चयन आवश्यक होता है । सत्कर्म मुक्ति प्रवृत्त करते हैं । दागी कर्म मोंह प्रवृत्त करने वाले होते है । सन्यास कर्मों का त्याग नहीं होता । कर्म करते हुये कर्मके फल की कामना ना करना सन्यास होता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म सत्कर्म होते है । इच्छा की पुष्टि में किया जानेवाला कर्म दागी होता है । योगावस्था में सत्कर्मों को करना आत्मा को जानने के तुल्य होता है । 

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