कर्म जिन्हे
करते हुये मस्तिष्क में किसी फल विषेस की कामना विद्यमान रहे वे कर्म आत्मा को
प्रकृतीय मोंह की ओर प्रवृत्त करने वाले होते हैं । ऐसे कर्म सत्कर्म नहीं कहे
जावेंगे । इन्हे करने से आसक्ति की वृद्धि होती है । सच्चा कर्म वह होता है जिसे
करते हुये मस्तिष्क में कर्म के फल के प्रति लिप्सा ना विद्यमान रहे । योगावस्था
में किये जाने वाले कर्मों के विचार में भी सत्कर्म का चयन आवश्यक होता है ।
सत्कर्म मुक्ति प्रवृत्त करते हैं । दागी कर्म मोंह प्रवृत्त करने वाले होते है ।
सन्यास कर्मों का त्याग नहीं होता । कर्म करते हुये कर्मके फल की कामना ना करना सन्यास
होता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म सत्कर्म होते है । इच्छा की पुष्टि में किया
जानेवाला कर्म दागी होता है । योगावस्था में सत्कर्मों को करना आत्मा को जानने के
तुल्य होता है ।
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