आत्मा अपने
मौलिक स्वरूप में ना ही स्वयं किसी कार्य की कर्ता होती है और ना ही वह किसी अन्य
के कार्य का माध्यम बनती है और ना ही वह कर्म के फल तथा कर्म में किसी प्रकार का
सम्बंध ही जोडती है । उपरोक्त अभिव्यक्ति में प्रयुक्त “ अन्य के कार्य का माध्यम “ के व्याख्या की आवश्यकता है । अन्य – कई बार मनुष्य कोई ऐसा कार्य भी करता है जिसे कि कहा
जाता है कि वह किसी परवशता में कर रहा है । परवसता एक ऐसी दशा जिसका सही निरूपण
अग्रेजी भाषा के शब्द hypnotism
द्वारा व्यक्त होता है । एक ऐसी दशा जो उसके वश
में नहीं है परंतु वह उस दशा के अनुसार उसे पालन करने को बाध्य है । इसी स्थिति को
उपरोक्त कथन में “ अन्य के कार्य का माध्यम “ द्वारा व्यक्त किया गया है । आत्मा ना ही स्वयं अपने
सज्ञान में किसी कार्य की कर्ता बनती है और ना ही किसी परवसता की दशा में भी किसी
कार्य की कर्ता बनती है और ना ही कार्य के परिणाम की कार्य से सम्बंध ही जोडती है
। अत्मा का मौलिक स्वरूप अर्थात वह स्वरूप जिसमें वह ब्रम्ह से विलग हो प्रकृति के
मध्य आत्मा के रूप में स्थापित की गई । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा । यह स्थिति
आसक्त आत्मा के सुधार द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है और मौलिक स्वरूप में तो होती
ही है । प्रकृतीय मोंह से अछूती आत्मा उपरोक्तानुसार आचरण क्यों करती है क्यों कि उपरोक्त
समस्त की कर्ता प्रकृति होती है ।
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