मंगलवार, 4 मार्च 2014

ज्ञान यात्रा

शरीर एक कार्य करने का यंत्र । इस स्वरूप में जो व्यक्ति इस शरीर का प्रयोग कर सकेगा उसके कर्म त्रुटियों से मुक्त होंगे । कार्य करने के यंत्र में अनेक अंग प्रदान किये हैं प्रकृति ने । समस्त अंगों का नियंत्रण निहित किया है मस्तिष्क में । इन कारणों से कार्य की गुणवत्ता में मस्तिष्क की यथा स्थिति सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान प्रदानकरने वाली होती है । योग मस्तिष्क की यथास्थिति को संयमित एवं नियंत्रित करने के उद्देष्य से शोध किया गया है । मस्तिष्क की कार्य दक्षता को सर्वाधिक क्षति पहुँचाने वाला अवयव होता है इच्छायें । प्रकृति के प्रति मोंह । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । जो व्यक्ति इन सत्यों को अपने मस्तिष्क में धारण कर जीवन जीयेगा । जो व्यक्ति इन समस्त सत्यों को सत्य मान अपने कर्म की गुणवत्ता का उत्थान लक्ष्य करेगा । उसे योग की अनुशंसा के अनुसार आचरण करना होगा । प्रयत्नशील व्यक्तियों में भी सभी की उपलब्धियाँ एक समान नहीं होंगी । परंतु प्रयत्न एक ऐसी विधा है जो हर असम्भव को सम्भव बनाती है । निष्ठा होनी चाहिये ।
कार्य के अवयव होते हैं कार्य का लक्ष्य, कार्य करने का साधन, कार्य करने का निमित्त, और कार्य करने वाला व्यक्ति । उपरोक्त चार अवयवों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है कार्य करने वाला व्यक्ति । जिस व्यक्ति की जितना ही सुनियंत्रित, और सुसंयमित व्यक्तित्व होगा वह उतना ही गुणवत्ता युक्त कार्य संचालन प्रदान कर सकेगा । यह समस्त उपलब्धि किसी व्यक्ति विषेस की अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों द्वारा ही मिलती है । ज्यादा से ज्यादा उसे अपने को सही स्वरूप में निर्माण करने के लिये पथ का सुझाव बाह्य माध्यमों से प्राप्त हो सकता है । बाह्य सहायता का मिलना, उस सहायता को ग्रहण करने का विवेक, यह प्रकृति की कृपा पर निर्भर करता है । सुधार अथवा पतन की प्रक्रिया अनेकों जन्मो पर्यंत चलती रहती है । सोया हुआ इंसान जब जाग जाय तभी सबेरा है । अज्ञान का अंधकार समस्त मनुष्य समुदाय को एक समान आच्छादित किये हुये है । ज्ञान के प्रकाश के लिये जो उद्यमी जितनी निष्ठा से प्रयत्नशील होगा उतना ही उत्थान सम्भव होगा । जिन्हे प्रकृतीय मोंह की लिप्सा ही प्रिय होगी उनके लिये यह समस्त चर्चा किसी अर्थ की नहीं होगी ।

प्रकृति का कर्ता स्वरूप । प्रकृति की नियंत्रण क्षमता । प्रकृति का व्यापक विस्तार । प्रकृति में ब्रम्ह का दर्शन । जो व्यक्ति जितना ही अपनी धारणा में निहित कर सकेगा उतना ही उसका जीवन सरल होगा । अशांति उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ नियंत्रित होंगी । शांत जीवन आनंद का प्रतीक है । यह समस्त स्थितियों योगावस्था में कार्य का अभ्यास करने से सुलभ होती है । प्रत्येक व्यक्ति इसके लिये योग्य पात्र है । 

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