बुधवार, 12 मार्च 2014

द्वैत

द्वैत आत्मा और प्रकृति में होता है । विषय और वस्तु का भेद है । आत्मा और शरीर में कोई द्वैत नहीं होता । शरीर कोई भी होवे । मनुष्य की, बंदर की, पक्षी की, जलचर जीव की, ज्ञानी पुरुष की अथवा हीन वर्ण के पतित मनुष्य की । प्रत्येक शरीर में प्रेरक आत्मा अभिन्न है । आत्मा और प्रकृति के भेद को जानना ही विज्ञान है । मनुष्य का ज्ञान उसके अज्ञान की तुलना में अति अल्प है । जब कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होता है तब अज्ञान के विषाल स्वरूप का भान होता है । थोडा ज्ञान होने पर हठधर्मिता जन्म लेती है । थोडा अधिक ज्ञान होने पर प्रश्नों का जन्म होता है । और अधिक ज्ञान के प्रयत्न करते हुये जब वह अनुभव करता है कि पाने को ज्ञान बहुत है पर सामर्थ्य समाप्त हो रहा है । तब जन्म होता है प्रार्थना विनय का । यह स्वाभाविक क्रम है ।

द्वैत का ज्ञान मस्तिष्क में धारण किये हुये जो संत पुरुष ब्रम्हके अविभाजित स्वरूप को हर प्रत्येक प्राणी में देखता है उसे सम दृष्टि कहते हैं । सिद्ध योगी की स्थिति प्राप्त मनुष्य ही सम दृष्टि होता है । उसे प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह का स्वरूप दीखता है ।    

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