जो मनुष्य
प्रकृतीय मोंह से पूर्णतया मुक्त होकर अपने कर्मों को प्रकृति को समर्पित कर करता
है उससे कोई पाप नहीं होता है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति के लिये कार्यों को योग
की दशा में करने का अभ्यास । मोंह से मुक्ति पाकर किये जाने वाले कर्म सन्यास की
स्थिति को प्राप्त कराते है । मोहासक्त आत्मा को मोंह से मुक्त कराना ही अभीष्ट
होता है । मोक्ष ही शांति की आनंदमय स्थिति की प्राप्ति है । इस प्रकार मोहासक्त
आत्मा की मोंह से मुक्ति कराने के लिये योग । योग को पाने के लिये प्रकृति के
कर्ता स्वरूप की ग्राह्यता । यह सभी परस्पर सम्बद्ध स्थितियाँ हैं । सभी का सम्बंध
मस्तिष्क की यथास्थिति से है । कार्यों को करते हुये अपने को उन्नति के पथ पर
बढाने के लिये कार्यों को सही ढंग से करने का अभ्यास । कार्यों को करने के लिये
प्रेरणा ग्रहण करने का श्रोत का सही चयन । कार्यों को करने के निमित्त का निर्धारण
स्थल । इन तीनो के सही चयन और क्रियांवन द्वारा मिलेगी मुक्ति । आसक्त आत्मा की
मोंह से मुक्ति ।
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