रविवार, 23 मार्च 2014

मोंह से मुक्ति

जो मनुष्य प्रकृतीय मोंह से पूर्णतया मुक्त होकर अपने कर्मों को प्रकृति को समर्पित कर करता है उससे कोई पाप नहीं होता है । प्रकृतीय मोंह से मुक्ति के लिये कार्यों को योग की दशा में करने का अभ्यास । मोंह से मुक्ति पाकर किये जाने वाले कर्म सन्यास की स्थिति को प्राप्त कराते है । मोहासक्त आत्मा को मोंह से मुक्त कराना ही अभीष्ट होता है । मोक्ष ही शांति की आनंदमय स्थिति की प्राप्ति है । इस प्रकार मोहासक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति कराने के लिये योग । योग को पाने के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप की ग्राह्यता । यह सभी परस्पर सम्बद्ध स्थितियाँ हैं । सभी का सम्बंध मस्तिष्क की यथास्थिति से है । कार्यों को करते हुये अपने को उन्नति के पथ पर बढाने के लिये कार्यों को सही ढंग से करने का अभ्यास । कार्यों को करने के लिये प्रेरणा ग्रहण करने का श्रोत का सही चयन । कार्यों को करने के निमित्त का निर्धारण स्थल । इन तीनो के सही चयन और क्रियांवन द्वारा मिलेगी मुक्ति । आसक्त आत्मा की मोंह से मुक्ति । 

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