धर्म प्रशस्थ
करता है जीवन जीने का पथ । जीवन एक एकाकी मनुष्य का । जीवन एक समुदाय का । जीवन
पूरे मानव समाज का । भारतीय धर्म दर्शन में दो शब्द विख्यात हैं । पाप और पुण्य ।
पाप वह कर्म है जिससे अगले बंदे को कष्ट पहुँचे पीडा हो । पुण्य वह कर्म है जिससे
अगले बंदे को सुख मिले । कितनी सरल पहचान बतायी गयी । कोई भी कभी भी कहीं भी अपने
कर्म का परीक्षण स्वयँ करे । उपरोक्त परिभाषा के अनुसार । उसका कर्म जो उसने किया
किस श्रेणी का था । पाप अथवा पुण्य । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को कष्ट मिला
है तो वह पाप था । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को सुख मिला है तो वह पुण्य था
। इस प्रकार कोई भी कहीं भी किसी समय भी अपने किये गये कर्म का परीक्षण स्वयँ कर
देख सकता है । फिर आगे धर्म दर्शन बताता है कि पुण्य करो और पाप मत करो । यह मानक
भी कितना सरल है । क्या करे या क्या ना करें । पुण्य करें और पाप ना करें । वह
कर्म करें जिससे अगले बंदे को सुख मिले । वह कर्म ना करें जिससे अगले बंदे को कष्ट
पहुँचे । कितना उदार विश्व बंधुत्व का पथ । यदि समाज में कंचिद प्रत्येक मनुष्य इस
मानक को अपने जीवन जीने का आदर्श बना ले तो कल्पना करें कि किस स्तर का सद्भाव
समाज में व्याप्त होगा । धर्म दर्शन मार्ग बताता है । उसे अपनाना मनुष्य का अपना
विवेक है । धर्म दर्शन किसी को बाध्य नहीं करता । कोई यदि अपने उत्थान को चेष्टारत
होवे तो उसे स्वयँ अपने कर्मों को परीक्षित करते अपने को सुधारते आगे बढने का पथ
है । पुण्य करो और पाप मत करो । जिस कार्य से अगले बंदे को सुख मिले उसे और अधिक
करने की चेष्टा की जाय । जिस कर्म से अगले बंदे को कष्ट पहुँचे उन्हे ना किया जाय
। दूसरे की समीक्षा की अपेक्षा अपने को सुधारना अधिक अपने वश का होता है । दूसरे
की समीक्षा पता नहीं प्रभावी होगी या नहीं परंतु अपने को सुधारने का प्रयत्न शत
प्रतिशत सफल होगा ।
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