शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

धर्म प्रशस्थ करता है जीवन जीने का पथ । जीवन एक एकाकी मनुष्य का । जीवन एक समुदाय का । जीवन पूरे मानव समाज का । भारतीय धर्म दर्शन में दो शब्द विख्यात हैं । पाप और पुण्य । पाप वह कर्म है जिससे अगले बंदे को कष्ट पहुँचे पीडा हो । पुण्य वह कर्म है जिससे अगले बंदे को सुख मिले । कितनी सरल पहचान बतायी गयी । कोई भी कभी भी कहीं भी अपने कर्म का परीक्षण स्वयँ करे । उपरोक्त परिभाषा के अनुसार । उसका कर्म जो उसने किया किस श्रेणी का था । पाप अथवा पुण्य । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को कष्ट मिला है तो वह पाप था । यदि उस कर्म विषेस से अगले बंदे को सुख मिला है तो वह पुण्य था । इस प्रकार कोई भी कहीं भी किसी समय भी अपने किये गये कर्म का परीक्षण स्वयँ कर देख सकता है । फिर आगे धर्म दर्शन बताता है कि पुण्य करो और पाप मत करो । यह मानक भी कितना सरल है । क्या करे या क्या ना करें । पुण्य करें और पाप ना करें । वह कर्म करें जिससे अगले बंदे को सुख मिले । वह कर्म ना करें जिससे अगले बंदे को कष्ट पहुँचे । कितना उदार विश्व बंधुत्व का पथ । यदि समाज में कंचिद प्रत्येक मनुष्य इस मानक को अपने जीवन जीने का आदर्श बना ले तो कल्पना करें कि किस स्तर का सद्भाव समाज में व्याप्त होगा । धर्म दर्शन मार्ग बताता है । उसे अपनाना मनुष्य का अपना विवेक है । धर्म दर्शन किसी को बाध्य नहीं करता । कोई यदि अपने उत्थान को चेष्टारत होवे तो उसे स्वयँ अपने कर्मों को परीक्षित करते अपने को सुधारते आगे बढने का पथ है । पुण्य करो और पाप मत करो । जिस कार्य से अगले बंदे को सुख मिले उसे और अधिक करने की चेष्टा की जाय । जिस कर्म से अगले बंदे को कष्ट पहुँचे उन्हे ना किया जाय । दूसरे की समीक्षा की अपेक्षा अपने को सुधारना अधिक अपने वश का होता है । दूसरे की समीक्षा पता नहीं प्रभावी होगी या नहीं परंतु अपने को सुधारने का प्रयत्न शत प्रतिशत सफल होगा । 

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