प्रकृति का व्यापक स्वरूप । जीव की
सूक्ष्म दशा । इन्हे बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते है –
यथाकाश्स्थितो नित्यं वायु: सर्वत्र्गो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारया ॥
जिस प्रकार वायु सर्वत्र विचरण के लिये
स्वतंत्र होते हुये भी आकाश space
के अंदर सीमित रहती है । उसी प्रकार समस्त जीव
मेरे अंदर सीमित दशा में स्थिति है ।
वायु प्राण का
आधार है । प्रकृति के समस्त व्यापक विस्तार में जीव निवास करते हैं । उन समस्त
जीवों के प्राणों को आधार प्रदान करने के लिये वायु को प्रकृति के समस्त विस्तार
में स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करने की छूट प्रकृति ने प्रदान की है । परंतु इतनी
स्वतंत्रता स्वीकृत करने के बावज़ूद भी प्रकृति ने वायु को आकाश की सीमा में सीमित
किया है । इस दृष्टांत के अवलम्ब से योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जीव कोटि की सीमित दशा
तथा उसे कार्य करने की स्वतंत्रता को व्यक्त किया है । दृष्टांत जो दृष्टि से देखे
जा सकते हैं । दृष्टि से देखा हुआ मस्तिष्क के स्मृति भण्डार में चिर रहता है ।
विस्मृत नहीं होता । इसलिये अपेक्षा की जाती है कि दृष्टांत विस्मृत नहीं होगा ।
इस वर्तमान दृष्टांत में योगेश्वर प्रकृति के व्यापक स्वरूप और प्रकृति का जीव के
कर्मों के नियंत्रण की क्षमता को व्यक्त करने के उद्देष्य से वायु जो प्रचण्ड
शक्ति की धारक होती है को आकाश की सीमाओं में निहित बता कर प्रकृति की व्यापक
शक्ति और नियंत्रण सामर्थ्य को व्यक्त किया है ।
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