मस्तिष्क का वह भाग जिसमें पूर्व में
घटित घटनाओं पूर्व में ज्ञानेंद्रियों द्वारा लायी गयी बाह्य संसार की सूचनाये तथा
पूर्व जीवन के अनुभवों का भण्डारण संचित रहता है स्मृति के नाम से जाना जाता है । स्मृतियों
का प्रत्येक मनुष्य के जीवन पर विशिष्ट व विलक्षण प्रभाव होता है । स्मृतियों के
सहारे से मनुष्य अपने वर्तमान के कार्य के सम्बंध में निर्णय लेता है । स्मृतियाँ
अतीत और वर्तमान के मध्य सेतु के समान होती है । अतीत और वर्तमान को जोडती हैं ।
स्मृतियाँ बिक्षुडे हुये सम्बंधों को जोडती भी हैं । स्मृतियाँ ऐसी सशक्त यंत्र
होती हैं जो मनुष्य के कर्म को प्रभावी रूप से अंकुश करती है । विगत जीवन की
वासनाओं की स्मृतियाँ वर्तमान जीवन के सन्यास के प्रय्त्नों के लिये विघ्न के
स्वरूप में प्रगट होती हैं । स्मृतियाँ मनुष्य के वर्तमान दु:खों के प्रकरण में एक
सहायक निवारण श्रोत के रूप में काम करती हैं । स्मृतियों से मनुष्य को कार्य करने
का उत्साह भी मिलता है । स्मृतियों से मनुष्य कार्य करने से विरक्त होने की चेष्टा
भी करता है ।
मस्तिष्क के योगावस्था में कार्य करने के
विचार की दशा में स्मृतियाँ विषेस महत्वपूर्ण भूमिका की होती है । मनुष्य के किसी
भी अच्छे कार्य के प्रयत्न में बाधाये स्वाभाविक क्रम में उपस्थित होती हैं । योगावस्था
के अभ्यासी के प्रयत्नों में उसके विगत जीवन की वासनाओं की स्मृतियाँ एक विघ्न के
स्वरूप में उपस्थित होती हैं । योगावस्था संयमित जीवन शैली का पथ है । वासनाओं की
स्मृतियाँ जीवन के संयम के प्रयत्नों का नाश करने वाली होती हैं । योगाभ्यासी को
स्मृतियों से विशेस सावधानी की आवश्यकता होती है । प्रकृति की कार्य शैली इतनी प्रखर
होती है कि वह किसी मनुष्य को उसी की स्मृतियों के सहारे कितनी सरलता से उसके संयम
के प्रयत्नों से विचलित कर देती है कि कंचिद वह मनुष्य जान भी नहीं पाता कि वह कब
भटक गया । मनुष्य की स्मृतियाँ उसकी अपनी निधि के समान होती हैं । स्मृतियों के
भण्डार से जब कोई उसकी विगत स्थिति वर्तमान के रूप में प्रगट होती है तो उसे
तत्काल ग्रहण करने में उसे रंचमात्र विलम्ब नहीं होता क्योंकि वह उसकी अपनी होती
हैं । यदि कंचिद विगत की अपूर्ण वासनायें स्मृति भण्डार से प्रगट हुई तो उसे अपने
वर्तमान योगाभ्यास के प्रयत्नों को भूलते और वासनाओं की पूर्ति हेतु उद्यत होते जरा
भी देर नहीं होगी ना ही उसे कोई संकोच ही होगा । स्मृतियाँ प्रकृति का अत्यधिक
सशक्त कार्यकारी यंत्र है । योगाभ्यासी मनुष्य को इससे अति सावधान रहना चाहिये ।
किसी भी अच्छी उपलब्धि के लिये सजग
चेष्टा अपेक्षित होती है । प्रकृति में जीवन शक्ति भी है । प्रकृति में विनाश
क्षमता भी है । प्रकृति ही जननी भी है । प्रकृति ही यम भी है । सज्ञान पूर्वक
संयमित अनुशासित कर्म करते जीवन यापन योग पथ है । प्रकृति में मोह पतन है । आत्मा
ब्रम्ह का अंश है । उसकी प्रकृति में आसक्ति हेय स्थिति है । ब्रम्ह ने अपने अंश
को प्रकृति के मध्य प्रकृति पर शासन करने के उद्देष्य से रखा है । शासक का अपनी
उत्पत्ति में आसक्ति शर्मनाक है । प्रकृति अपने गुणों के द्वारा आत्मा को रिझाने
का हर सम्भव प्रयत्न करती है । अपनी आत्मा को ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप कायम रखना
हर प्रत्येक आत्माधारी का कर्तब्य है । इस कर्तब्य निर्वाह के लिये योगावस्था में
कर्मों को करने का अभ्यास ही एकसूत्रीय विधा है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें